क्या नग्न स्त्री प्रतिमाएं ही अच्छे कलाकार की पहचान हैं?

कौन देखे बदन के आगे औरत को…                                  सबकी आँखे गिरवी है इस नगरी मे। –   हामिदा शाकिर

सन् 1997 में एक चर्चित मूवी आई थी इश्क़ नाम की उसमें एक सीन है जहां “शॉपिंग माल में एक प्रतिमा लगी होती है जिसका उद्घाटन होना होता है और वह अजय से गिरकर टूट जाती है ” काफी हास्यप्रद है यह सीन वैसे ,लेकिन मैं ध्यान दो मिनट के आनंद की तरफ नहीं बल्कि सदियों पुरानी सोच की तरफ ले जाना चाहती हूँ जो बे-लिबाज् , नग्नावस्था में खड़ी रहती है उस सीन में ,स्त्री -प्रतिमा के रूप में ।

वो कोई पहली मूवी नहीं थी जिसमें स्त्री प्रतिमा के शरीर से सारे अवरण हटाए गए हो , 19वी शताब्दी से ही स्त्री की कामुक तस्वीरें, प्रतिमाएं, पुतले ,आदि को बनाया ,लगाया और प्रदर्शित किया जा रहा है और प्रदर्शित करने का लिहाज ऐसा की कोई पुरुष देखें तो शरीर की रेखाओं, अदाओ और नशीली आंखों को देखते ही उसे हासिल करने का भाव मन मे बैठ जाए ,उनकी बनावट ऐसी होती है कि लगता है बस अभी बोल पड़ेंगी , पुरुष के कामुक मस्तिष्क से खेलने का इससे अच्छा तरीका और भी हो सकता है कुछ?

जिस तरह हमारे हिंदी साहित्य के रीति काल में राजाओं को प्रसन्न रखने के लिए नायिका भेद,अश्लीलता और कामुकता परोसी जाती थी ठीक उसी प्रकार पश्चिम मे राजाओं को प्रसन्न करने के लिए पेंटिंग्स,पोट्रेट्स, और प्रतिमाएं बनायीं जातीं थीं। चलिए तब का समय छोड़ देते हैं वो राजा – राजे की बात थी उनको खुश रखना होता था लेकिन ….आज? 

 आज के समय क्यूँ ऐसी स्त्रियों के चित्र उकेरे जा रहे हैं?किसको खुश करना है आज के कलाकारों को जो उनकी उंगलियां नग्न स्त्री बदन को इतनी बारीकी से तराश रहीं हैं? आज तो राजाओं का जमाना रहा नहीं तो किसको खुश किया जा रहा है ,क्यूँ खुश किया जा रहा है ? इन सवालों के जवाब मे बस इतना ही पाती हूँ,मैं कि कलाकारों को एक दायरा दिया गया है कलाप्रेमी लोगों द्वारा, और उनकी स्वयम की सोच द्वारा भी कि अगर वो एक आकर्षक , कामुक , उत्तेजक नग्न स्त्री की पेंटिंग , या पुतला बना देंगे तो वे भी सफल हो जाएँगे ।

कभी -कभी जब मैं ऐसे कलाकार को बैठे देखती हूँ तो सोचती हूँ कि जरूर ये सोच रहा होगा कि जिन्दगी में एक नग्न मूर्ति या पेंटिंग ना बनायीं तो मैं कलाकार कहलाने का हक़दार नहीं।


इन सब बातों पर तो इतना हैरान नहीं थी ,मेरी हैरानी कि मुख्य वजह तो ये है कि लडकियां भी इस प्राचीन परम्परा का निर्वाह बाखूबी कर रही है , उन्होंने सोचा ही नहीं शायद कि वो जिसे कला समझ बना रही है वो कभी पुरुष लोगो के मनोरंजन का साधन थी। 

(यार लड़कियों थोड़ा तो समझो अब ! गज़ब करती हो मेरी जान आप लोग भी ) । 

   

 नग्न स्त्री कलाकृतियों ने ऐसा असर छोड़ दिया है हमारे समाज पे कि आज ये भी नहीं सोचा जा रहा सौ-दो सौ साल पहले लोगों मे जिस चीज़ कि जिज्ञासा रहती थी आज वो इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है , आज स्त्री के बदन को खुलेआम प्रदर्शित करने की कोई जरूरत नहीं , आज हरव्यक्ति(बच्चा,बूढ़ा,बड़ा) स्त्री के नख से लेकर शिख तक वाकिफ है ।


मज़े की बात एक ये भी कि जो लोग स्त्री को पूरा तन ढकने के हिमायती होते है जिन के घर कि स्त्रियां ऊपर से नीचे तक नौव्वार से लिपटी रहती है उनके ही घर मे आप सबसे ज्यादा नंग्न स्त्री कलाकृतियां पाएंगे।

मुझे नहीं पता कामुकता स्त्री बदन मे होती है या पुरुष सोच में लेकिन यह तय है जिस दिन स्त्री ने खुद को पुरुषो को रिझाने की वस्तु समझना बंद किया उस दिन पुरुषो की सोच बदल जाएँगी ,और जिस दिन पुरुष ने स्त्री को कामपूर्ति का साधन समझना बंद कर दिया उस दिन दुनिया बदल जाएगी। 

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