जब …नारद मुनि को होना पड़ा रिश्वतखोरी का शिकार…. part 2

मैं आप लोगों को भ्रष्टाचारी और घूसखोरी के मकडजाल की मजबूती दिखाते हुए, हरीशंकर परसाई रचित “भोलाराम का जीव” कहानी सुना रही हूँ। जिसमें देवलोक से भोलाराम की आत्मा ढूंढने पृथ्वी पर आए हुए नारद मुनि को भी भोलाराम की पेंशन के कागज पर “वेट” रखना पड़ता है। यूँ तो यह कहानी कल्पना मात्र है लेकिन इसमें जो परिस्थितिया दिखाई गई हैं वो एकदम सच हैं, हकीकत हैं। इसीलिए इसे संजीदा होकर पढियेगा।

👉पढ़े इस कहानी का पहला पार्ट 

वहाँ से चलकर नारद सरकारी दफ़्तर में पहुँचे। वहाँ पहले ही कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस में बारे में बातें कीं। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला, “भोलाराम ने दरख्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी।” 

नारद ने कहा, “भई, ये बहुत-से ‘पेपर-वेट’ तो रखे हैं । इन्हें क्यों नहीं रख दिया ?”

बाबू हँसा, “आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख्वास्तें ‘पेपर- वेट’ से नहीं दबतीं। खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए। “

नारद उस बाबू के पास गए। उसने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पाँचवें के पास । जब नारद पचीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा, “महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए। आप अगर साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहें, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर लिया, तो अभी काम हो जाएगा।”

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था, इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। बिना ‘विजिटिंग कार्ड’ के आया देख, साहब बड़े नाराज हुए। बोले, “इसे कोई मन्दिर- वन्दिर समझ लिया है क्या ? धड़धड़ाते चले आए। चिट क्यों नहीं भेजी ?”

नारद ने कहा, “कैसे भेजता ? चपरासी सो रहा है।

क्या काम है?” साहब ने रोब से पूछा ।

नारद ने भोलाराम का पेंशन-केस बतलाया 

साहब बोले, “आप हैं वैरागी । दफ़्तरों के रीति-रिवाज़ नहीं जानते । असल में भोलाराम ने ग़लती की। भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं, उन पर वज़न रखिए।’

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई। साहब बोले, “भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ़्तरों में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है, उतने की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ, जल्दी भी हो सकता है, मगर…” साहब रुके।

नारद ने कहा, “मगर क्या ?”

साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, “मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वजन भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है।मेरी लड़की गाना-बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा। साधुओं की वीणा तो बड़ी पवित्र होती है। लड़की जल्दी संगीत सीख गई, तो उसकी शादी हो जाएगी।”

नारद अपनी वीणा छिनते देखकर जरा घबराए। पर फिर सँभलकर उन्होंने वीणा टेबिल पर रखकर कहा, “यह लीजिए। अब जरा जल्दी उसकी पेंशन का ऑर्डर निकाल दीजिए।”

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुरदी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजाई। चपरासी हाज़िर हुआ। साहब ने हुक्म दिया, “बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ।”          थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़ सौ दरख्वास्तों से भरी फ़ाइल लेकर आया। उसमें पेंशन के काग़ज़ात भी थे। साहब ने फ़ाइल पर का नाम देखा और निश्चित करने के लिए      पूछा, “क्या नाम बताया साधुजी आपने ?”

नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए ज़ोर से बोले, “भोलाराम !’

सहसा फ़ाइल में से आवाज़ आई, “कौन पुकार रहा है मुझे ? पोस्टमैन है क्या ? पेंशन का ऑर्डर आ गया ?”

साहब डरकर कुर्सी से लुढ़क गए। नारद भी चौंके। पर दूसरे ही क्षण समझ गए। बोले,

भोलाराम ! तुम क्या भोलाराम के जीव हो ?”

“हाँ,” आवाज़ आई।

नारद ने कहा, “मैं नारद हूँ। मैं तुम्हें लेने आया हूँ। चलो, स्वर्ग में तुम्हारा इन्तजार हो रहा है। “आवाज़ आई, “मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों में अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।

Corruption is like a ball of snow , once it’s set a rolling it must be increase. – Charles caleb colten.

तो ये थी एक व्यंगपूर्ण कहानी के रूप में आज के समय की सच्चाई।ना जाने कितने भोलाराम पेंशन के लिए इधर-उधर घूम रहें हैं और ना जाने कितनों की आत्माएं उनकी फाइल्स में ही दबी कुचली पड़ी हैं। लेकिन इसमें दुःख की बात पता हैं क्या है? वो ये की इनकी सिफारिश के लिए कोई नारद नहीं आता, इनके बच्चों के पेट की आग किसी को नहीं दिखाई देती और इनकी बीवियों का रोना किसी को नहीं सुनाई देता। दिखता इसलिए नहीं क्योंकि आँखों पर लालच की पट्टी बंध गई है और सुनाई नहीं देता क्योंकि चापलूसी से भरे शब्दों के कचरे कान को रून्ध गए हैं। अन्ना हजारे जी ने कहा था कि भ्रष्टाचार खत्म तो नहीं होगा लेकिन लोग जिम्मेदार बने तो 40-50 प्रतिशत कम जरूर हो सकता है। और अगर युवा इस के खिलाफ जागरूक हो जाए तो क्या ही कहने!

The duty of youth is to challenge corruption . 

                        Kurt Cobain

भ्रष्टाचार वेश्यावृत्ति से भी बदतर है। वेश्यावृति किसी एक व्यक्ति की नैतिकता खतरे में डालती है, भ्रष्टाचार निर्विरोध रूप से पूरे देश को खतरे में डालता है। – कार्ल क्रास

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