“खगम” सत्यजीत रे की हाॅरर कहानी

 हम पेट्रोमैक्स की रोशनी में बैठकर डिनर ले रहे थे । कुल मिलाकर अभी अण्डे को दाँत से काटा ही होगा कि चौकीदार लछमन सिंह ने आकर पूछा, ‘आप लोग इमली बाबा के दर्शन नहीं करेंगे?”                                                                लाचार होकर उससे कहना पड़ा कि इमली बाबा का नाम हमारे लिए बिलकुल नया है। इसलिए दर्शन करने का प्रश्न खड़ा ही नहीं होता । लछमन ने कहा कि जंगल विभाग की जो जीप हम लोगों के लिए नियुक्त की गई है, उसके ड्राइवर को कहने से ही वह हमें बाबा के डेरे पर ले जाएगा। जंगल के भीतर ही उनकी कुटिया है। वहाँ का परिवेश बड़ा ही मनोरम है और वे एक पहुँचे हुए साधु हैं। भारतवर्ष के नाना स्थानों से लोग आकर उनके दर्शन कर जाते हैं, इत्यादि-इत्यादि । जिस बात को सुनकर सबसे अधिक आश्चर्य हुआ वह यह कि बाबा के पास एक पालतू नाग है और वह बाबा की कुटिया के समीप ही एक गड्ढे में रहता है। हर रोज शाम के वक्त गड्ढे से निकलकर वह बाबा के पास आता है और बकरी का दूध पीता है। 

सब कुछ सुनने के बाद धुर्जटि बाबू ने अपना मंतव्य प्रकट किया कि इस देश में दिन-दिन बाजीगरी का बोलबाला हो रहा है, खासकर पाखंडी-साधु-संन्यासियों की संख्या बेहिसाब बढ़ती जा रही है। पाश्चात्य देशों में विज्ञान का प्रभाव जितना बढ़ता जा रहा है, हमारा देश उतना ही कुसंस्कारों के अँधेरे की ओर बढ़ता जा रहा है। ‘होपलेस मामला है साहब! सोचते ही दिमाग गरमा जाता है।’ 

यह कहकर धुर्जटि बाबू ने काँटा चम्मच नीचे रख दिया और बगल से फ्लाइ-फ्लैप यानी मक्खी मारने वाली छड़ी उठाकर उसे मेज पर पटक दिया और एक मच्छर का खून कर डाला। धुर्जटि बाबू की उम्र पैंतालीस से पचास के बीच होगी। नाटा कद । दुबला, गोरा, चमकता हुआ चेहरा। पीली-पीली आँखें । भरतपुर आने पर ही उनसे जान-पहचान हुई है। मैं आगरे से आया हूँ और मुझे मंझले भैया के पास जयपुर जाना है। वहाँ मैं दो सप्ताह की छुट्टी बिताने जा रहा हूँ। यहाँ आने पर जब डाकबंगला या टूरिस्ट लॉज में जगह न मिली तो अन्त में काफी खर्च करने के बाद शहर के फॉरेस्ट रेस्टहाउस में जगह मिली। इसमें पछतावे की कोई बात नहीं है, क्योंकि जंगल से घिरे रेस्टहाउस में रहने से रोमांचकारी आराम महसूस होता है। धुर्जटि बाबू मुझसे एक दिन पहले आए हैं। वे क्यों आए हैं, यह बात अभी तक खोलकर नहीं बताई है, हालाँकि सैर-सपाटे के अलावा कोई दूसरा कारण होना जरूरी नहीं है। हम दोनों एक ही जीप से सैर-सपाटे करते हैं। कल हम यहाँ से बाईस मील दूर दीग नामक एक स्थान के किले और प्रासाद देखने गए थे। आज सुबह भरतपुर का किला भी देख लिया है। तीसरे पहर केवलादेव की झील के पक्षियों का आवास स्थान देखने गया था। वह एक बहुत ही दिलचस्प जगह है। झील सात मील से ज्यादा ही लम्बी होगी। बीच-बीच में टापू की तरह ऊँची जमीन है और उन्हीं जमीन के टुकड़ों पर राज्य भर के पक्षी आकर इकट्ठे हो गए हैं। उसमें से आधे से ज्यादा पक्षियों पर इसके पहले कभी मेरी नजर नहीं पड़ी थी। मैं अवाक् होकर पक्षियों को देख रहा था और धुर्जटि बाबू हर पल कुछ बुड़बुड़ाते जाते थे और अपने हाथों को नचाते हुए आसपास से भुनगों को भगाने की चेष्टा कर रहे थे। भुनगा एक प्रकार का छोटा कीड़ा होता है। वे झुंड बनाकर आते हैं और सिर के चारों ओर चक्कर काटकर नाक-मुँह पर बैठ जाते हैं। लेकिन वे इतने छोटे होते हैं कि उन्हें नजर-अन्दाज भी किया जा सकता है। मगर धुर्जटि बाबू बार-बार ऊब रहे थे। इस तरह धीरज खोने से काम कैसे चलेगा? साढ़े आठ बजे खाना-पीना खत्म कर, सामने के बरामदे में बैठे हम चाँदनी रात की शोभा देख रहे थे। मैंने धुर्जटि बाबू से कहा, “वह जिस साधु बाबा के बारे में कह रहा था, उन्हें देखने जाइएगा?” धुर्जटि बाबू ने अपनी सिगरेट को एक युकलिप्टस पेड़ के तने की ओर फेंकते हुए कहा, ‘नाग पालतू नहीं होता है, हो भी नहीं सकता। साँप के बारे में मैं काफी जानकारी रखता हूँ। बचपन में मैं जलपाईगुड़ी में रहता था और अपने हाथों से ढेरों साँप मार चुका हूँ। नाग वीभत्स और नम्बरी शैतान साँप होता है। उसे पालतू बनाना असम्भव है। इसलिए साधु बाबा के बारे में जो खबर मिली है उसमें कहाँ तक सचाई है,इस पर मुझे शक हो रहा है ľ’ मैंने कहा, ‘कल तीसरे पहर कोई प्रोग्राम है भी नहीं। सुबह बायान का किला देख लेने के बाद हम फ्री हो जाते हैं।’ ‘आप में क्या साधु-संन्यासियों के प्रति भक्ति है?’ इस सवाल के पीछे एक गहरा व्यंग्य है, यह बात मेरी समझ में आ गई। लेकिन मैंने उसका उत्तर सहज ही ढंग से दिया । 

‘इसमें भक्ति की बात कहाँ आती है, क्योंकि अभी तक मुझे साधु-संसर्ग का सुयोग नहीं मिला है। हाँ, कौतूहल जरूर है।’. ‘किसी जमाने में मुझमें भक्ति थी, लेकिन एक बार अनुभव हुआ तो फिर… धुर्जटि बाबू को जो अनुभव हुआ था। उसका वृत्तान्त दे रहा हूँ। वे ब्लडप्रेशर के मरीज हैं। दस वर्ष पहले अपने ताऊजी की बात में आकर उन्होंने एक साधु बाबा के द्वारा दी गई औषधि खा ली थी और उसके फलस्वरूप उन्हें सात दिन तक भयंकर पेट दर्द का सामना करना पड़ा था और रक्त का दवाब भी बढ़ गया था । उसी दिन से धुर्जटि बाबू ने यह धारणा बना ली है कि हिन्दुस्तान के सौ में नब्बे साधु पाखंडी और धूर्त्त हैं। उनका संन्यासियों के प्रति विद्वेष-भाव मुझे बड़ा ही दिलचस्प जैसा लग रहा था। इसलिए उनको भड़काने के खयाल से मैंने कहा, ‘आप या हम पालतू नहीं हो सकते हैं, मगर मैंने सुना है कि हिमालय में साधु और शेर एक ही गुफा में वास करते हैं ।’ ‘सुना ही है न, देखा तो नहीं?’ 

मुझे स्वीकारना पड़ा कि मैंने देखा नहीं है। ‘दीखेगा ही नहीं। हम लोगों का हिन्दुस्तान किस्सा-कहानी गढ़ने वाला देश है। सुनिएगा बहुत कुछ, मगर आँखों से देखना चाहिएगा तो कुछ भी नहीं दिखाई देगा। रामायण-महाभारत को ही लीजिए न! लोग कहते हैं कि वे इतिहास हैं, मगर असल में अजीब-अजीब कहानियों के डिपो हैं। रावण के दस सिर हैं। हनुमान पूँछ में आग लेकर लंकादहन कर रहा है । भीम की भूख, घटोत्कच, हिडिम्बा, पुष्पक, कुम्भकरण – इन सबों से बढ़कर नॉनसेन्स और क्या हो सकता है ? और अगर साधु-संन्यासियों के पाखण्ड की बात लें तो उसकी शुरुआत पुराणों से ही हुई है। लेकिन सारे देश के शिक्षित और अशिक्षित आदमी इतने दिनों से इसी पर विश्वास करते आ रहे हैं।’ 

बायान का किला देख लेने के बाद हम रेस्टहाउस में लौट आए और खाना खाकर आराम करने लगे। फिर चार बजे इमली बाबा के डेरे पर पहुँचे। इस बार धुर्जटि बाबू ने कोई आपत्ति नहीं की। हो सकता है बाबा के बारे में उनमें भी तनिक कौतूहल जग रहा हो । जंगल के बीच एक साफ-सुथरी और खुली जगह में एक विशाल इमली के पेड़ के नीचे बाबा की कुटिया है। पेड़ के नाम से ही बाबा का नाम इमली बाबा पड़ गया है और यह नाम स्थानीय लोगों ने ही दे रखा है। बाबा का असली नाम किसी को भी मालूम नहीं है । 

खजूर के पत्ते की कुटिया में अपने एकमात्र शिष्य के साथ बाबा भालू की खाल पर बैठे हैं। शिष्य कम उम्र का है। बाबा की उम्र का पता लगाना मुश्किल है। सूर्यास्त होने में अभी एकाध घण्टे की देर है। लेकिन इमली के पत्तों की घनी छांह के कारण उसी वक्त यहाँ अँधेरा फैल चुका है। कुटिया के सामने धूनी जल रही है। बाबा के हाथ में गाँजे की चिलम है। धूनी के प्रकाश में दिखाई पड़ा कि कुटिया के पास ही एक रस्सी टंगी हुई है। जिस पर अंगोछा और कोपीन के अलावा साँप की दसेक केंचुलें लटकी हुई हैं। 

हमें देखकर बाबा ने चिलम की फॉक से मुस्करा दिए। धुर्जटि बाबू न फुसफुसाकर कहा, ‘बेकार की बातें न कर असली प्रसंग की ही चर्चा कीजिए। पूछिए कि दूध किस वक्त पिलाया जाता है?? 

‘आप बालकिशन से मिलना चाहते हैं?” मुझे आश्चर्य हुआ कि इमली बाबा ने हमारे मन की बात कैसे जान ली। नाग का नाम बालकिशन है, यह बात जीप का ड्राइवर दीनदयाल कुछ देर पहले ही हमें बता चुका है। इमली बाबा से बताना पड़ा कि उनके साँप के बारे में हम सुन चुके हैं और पालतू साँप को दूध पीते हुए देखना चाहते हैं। हमें यह सौभाग्य प्राप्त हो सकेगा? इमली बाबा ने खेद की मुद्रा में सिर हिलाया और बताया, बालकिशन हर रोज सूर्यास्त के समय बाबा की पुकार सुनकर गड्ढे से निकलकर कुटिया में आता है और दूध पीकर चला जाता है। दो दिन पहले तक वह यहाँ आ चुका है मगर कल से उसकी तबीयत ठीक नहीं है। आज चूँकि पूर्णिमा है। इसलिए आज भी वह नहीं आएगा। कल से आना शुरू करेगा। 

साँप की तबीयत खराब होती है, यह बात मेरे लिए नई थी। लेकिन पालतू होने के कारण ऐसा हो भी सकता है। गाय, घोड़ा, कुत्ते इत्यादि के लिए अस्पताल हैं ही। बाबा के शिष्य ने एक और सूचना दी। एक तो उसकी तबीयत खराब थी, उस पर उसके गड्ढे में कुछ माटे घुस गए थे और उसे परेशान कर मारा था । बाबा के अभिशाप से वे माटे पंचत्व प्राप्त कर चुके हैं। यह बात सुनकर धुर्जटि बाबू ने तिरछी निगाहों से मेरी ओर देखा। मैं इमली बाबा की ओर देख रहा था। उनके चहरे में यों कोई खासियत नहीं है। एक मामूली-सी झब्बा पहने हैं। सिर पर जटा हैं, परन्तु वैसी नहीं कि कोई प्रभाव छोड़ सकें। कानों में लोहे का कुन्डल। गले में चारेक छोटी-बड़ी मालाएँ । दाहिने हाथ की कुहनी के ऊपर ताबीज । और साधुओं से इनमें कोई अन्तर नहीं दीखता है। फिर भी शाम की ढलती रोशनी में धूनी के पीछे बैठे उस व्यक्ति के चेहरे पर से मेरी आँखें दूसरी ओर जाना ही नहीं चाहती थीं। हमें खड़े देखकर शिष्य दो चटाइयाँ ले आया और बाबा से दसेक हाथ की दूरी पर उन्हें बिछा दिया। लेकिन बाबा का नाग दीखेगा ही नहीं तो बैठने से लाभ ही क्या? लौटने में ज्यादा देर करने से रात हो जाएगी। गाड़ी तो है, मगर रास्ता जंगल के भीतर से होकर जाता है और आसपास जंगली जानवरों की कमी नहीं। हिरनों के झुंड पर हर दिन नजर पड़ जाती है। अतः हम वहाँ बैठे नहीं। बाबा को जब हमने नमस्कार किया तो चिलम को बिना हटाए, आँखों को मूंदकर और माथे को झुकाकर उन्होंने हमें प्रतिनमस्कार जताया। हम दोनों सौ एक गज की दूरी पर खड़ी जीप की ओर रवाना हो गए। कुछ देर तक पेड़ों पर बैठे हुए पक्षियों का कलरव हमारे कानों में आता रहा। उसके बाद सन्नाटा रेंगने लगा। 

कुटिया से निकलने के बाद जब कुछ कदम आगे बढ़ गए तो अचानक धुर्जटि बाबू ने कहा, ‘साँप हम नहीं देख सके। मगर उसका गड्ढा एक बार देख लेने में हर्ज ही क्या है?” मैंने कहा, ‘इसके लिए इमली बाबा के पास जाने की कोई जरूरत नहीं। हम लोगों का ड्राइवर दीनदयाल बता ही चुका है कि उसे गड्ढे का पता है।” “आप ठीक ही कह रहे हैं।” गाड़ी से दीनदयाल को अपने साथ लेकर हम लौट आए। अबकी बार कुटिया की ओर न जाकर हम एक बादाम के पेड़ की बगल से होते हुए एक पगडंडी से थोड़ी दूर आगे बढ़े। सामने ही काँटों की एक झाड़ी थी। आसपास पत्थर के टुकड़ों को देखकर लगा कि किसी जमाने में यहाँ कोई इमारत रही होगी। दीनदयाल ने बताया, झाड़ी पीछे ही साँप का गड्ढा है। ऐसे देखा जाए तो कुछ भी पता नहीं चल सकता है, क्योंकि रोशनी और भी फीकी हो गई है। धुर्जटि बाबू ने अपनी जेब से एक छोटा-सा टार्च निकाला और झाड़ी पर रोशनी डाली। झाड़ी के पीछे का गड्ढा दिखाई पड़ने लगा । खैर, गड्ढा तो सचमुच ही है। मगर साँप ? वह क्या अस्वस्थ अवस्था में हमारे कौतूहल के निवारण के लिए बाहर निकलेगा? सच कहूँ, साधु बाबा के हाथ से नाग को दूध पीते हुए देखने की इच्छा रहने पर भी गड्ढे के सामने खड़े होकर साँप को देखने की मुझमें इच्छा नहीं थी। मगर धुर्जटि बाबू के मन में मुझसे कहीं अधिक कौतूहल था। रोशनी से जब काम नहीं निकला तो जमीन से चुन-चुनकर उन्होंने झाड़ी पर फेंकना शुरू कर दिया । मुझे उनकी यह ज्यादती अच्छी नहीं लगी। मैंने कहा, ‘क्या हुआ साहब? देख रहा हूँ, आप पर जिद सवार हो गई है। आपको तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि साँप है।’ अबकी उन्होंने एक बड़ा-सा ढेला हाथ में उठा लिया और बोले, ‘मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा है । इस ढेले से भी अगर कुछ नतीजा न निकला तो समझंगा कि बाबाजी के बारे में झूठमूठ का प्रचार किया गया है।’ 

ढेला जोर से आवाज करता हुआ झाड़ी पर गिरा और उसने काँटों और पत्तों को तहस-नहस कर दिया। धुर्जटि बाबू गड्ढे पर अब भी रोशनी डाले हुए थे। कुछ लमहों तक चुप्पी छाई रही- सिर्फ जंगल के अन्दर कहीं से झींगुर की आवाज आ रही थी। अब की उस आवाज के साथ और एक आवाज सुनाई दी। एक फीकी, बेसुरी सिसकारी जैसी आवाज। उसके बाद पत्तों की खड़खड़ाहट शुरू हुई और फिर टार्च की रोशनी में किसी चीज का काला और चिकना जैसा हिस्सा दिखाई पड़ा। वह चीज हिलडुल रही है, जीवित है और धीरे-धीरे गड्ढे के बाहर निकल रही है । अबकी झाड़ी के पत्ते हिल उठे और दूसरे ही क्षण उसके अन्तराल से साँप का माथा बाहर निकल आया। टार्च की रोशनी में नाग की जलती हुई आँखें दिखाई पड़ीं, उसके बाद उसकी दो भागों में विभक्त जीभ, जो बार-बार मुँह से बाहर निकलकर लपलपाने लगती थी और फिर अन्दर चली जाती थी। दीनदयाल कुछ देर पहले से ही लौटने का तकाजा कर रहा था। अबकी उसने भर्राई और अनुनयपूर्ण आवाज में कहा, ‘छोड़ दीजिए, बाबू! अब तो देख चुके, वापस चलिए।’ 

शायद टार्च के कारण ही बालकिशन अब भी अपना सिर निकालकर हमारी ओर घूर रहा है और बीच-बीच में जीभ बाहर निकाल रहा है। मैं ढेरों साँप देख चुका हूँ मगर इतने नजदीक से इस किस्म के नाग को नहीं देखा था। नाग आक्रमण करने की चेष्टा न कर इस तरह हमारी ओर घूर क्यों रहा है? ऐसा तो कभी नहीं देखा था। अचानक टार्च की रोशनी काँपती हुई वहाँ से अलग हट गई। उसके बाद जो काण्ड हुआ उसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था। धुर्जटि बाबू ने अचानक पत्थर का एक टुकड़ा उठाकर बालकिशन पर जोरों से फेंक दिया। उसके बाद एक-एक कर और दो पत्थर फेंके। एक भयंकर आशंका से घबराकर मैंने कहा, ‘आपने यह क्या किया धुर्जटि बाबू?” 

दीनदयाल हक्का-बक्का-सा झाड़ी की ओर ताक रहा है। धुर्जटि बाबू के हाथ से टार्च लेकर अबकी मैंने ही गड्ढे की ओर रोशनी डाली। बालकिशन के निढाल पड़े शरीर का थोड़ा-सा हिस्सा दीख रहा है। झाड़ी के पत्तों पर साँप के माथे से छिटका हुआ थोड़ा-सा खून लगा हुआ है। 

इस बीच कब इमली बाबा और उनके शिष्य हमारे पीछे आकर खड़े हो गए थे, इसका हमें पता ही नहीं चला। पहले धुर्जटि बाबू ही पीछे की तरफ मुड़े। उसके बाद मैंने भी मुड़कर देखा। बाबा हाथ में एक लाठी थामे हमसे करीब दस कदम की दूरी पर, एक बौने खजूर के पेड़ के पास खड़े हैं और धुर्जटि बाबू की ओर एकटक ताक रहे हैं। बाबा इतने लम्बे हैं, इसका अनुमान उस समय नहीं लग सका था जब वे बैठे थे। उनकी दृष्टि का वर्णन करना मेरी सामर्थ्य के परे है। इतना ही कह सकता हूँ कि विस्मय, क्रोध और विद्वेष से मिली-जुली ऐसी दृष्टि मैंने कभी किसी की नहीं देखी थी। 

बाबा का दाहिना हाथ सामने की तरफ उठ गया। वह हाथ धुर्जटि बाबू की ओर इंगित कर रहा है। हाथ की तर्जनी सामने की ओर आ गई और इससे इंगित और भी स्पष्ट हो गया। पहली बार मैंने देखा कि बाबा की हर उँगली का नख लगभग दो इंच लम्बा है। बाबा को देखकर मुझे किसका स्मरण आ रहा है? बचपन में देखा हुआ बीडन स्ट्रीट स्थित अपने मामा के घर की दीवार पर रवि वर्मा के द्वारा बनाए गए चित्र का ही मुझे स्मरण आ रहा है। दुर्वासा मुनि शकुन्तला को अभिशाप दे रहे हैं। ठीक उसी तरह से उनका हाथ उठा हुआ है, आँखों की दृष्टि भी वैसी ही है। मगर इमली बाबा ने अभिशाप नहीं दिया। अपनी गम्भीर और दबी आवाज में उन्होंने हिन्दी में जो कुछ कहा उसका अर्थ यही है – एक बालकिशन चला गया तो इससे हर्ज ही क्या है? एक दूसरा आ जाएगा। बालकिशन की मृत्यु नहीं हो सकती है। वह अमर है। 

धुर्जटि बाबू धूल से सने अपने हाथों को पोंछकर मेरी तरफ मुड़े और बोले, ‘चलिए।’ बाबा के शिष्य ने वहाँ आकर गड्ढे के मुँह से नाग की लाश को बाहर निकाला। शायद उसकी अन्त्येष्टि करने के खयाल से। साँप की लम्बाई देखकर मेरे मुँह से एक विस्मयसूचक शब्द अपने आप निकल आया। नाग इतना लम्बा हो सकता ऐसी मेरी धारणा नहीं थी। इमली बाबा धीरे-धीरे अपनी कुटिया की ओर चले गए। हम तीनों जीप पर बैठ गए। 

रेस्टहाउस वापस आते समय धुर्जटि बाबू को गुपसुम पाकर में उनसे बिना कुछ कहे न रह सका। ‘साँप जबकि उनका पालतू था और उसने आपकी कोई हानि नहीं की थी तो आपने उसे मारा ही क्यों?’ मैंने कहा। 

मेरा खयाल था कि वे साँप और साधुओं के बारे में कुछ कड़वी बातें कहकर अपने काले कारनामे के समर्थन की कोशिश करेंगे; मगर उन्होंने यह सब नहीं किया, बल्कि उलटे ही मुझसे एक अवान्तर प्रश्न पूछ बैठे ,“खगम कौन था साहब?” खगम ? नाम तो परिचित जैसा लगता है। मगर याद नहीं आ रहा है कि इसके बारे में कहाँ मैंने पढ़ा या सुना है। धुर्जटि बाबू ने दो-बार और खगम शब्द का उच्चारण किया और आखिर में चुप हो गए। जब हम रेस्टहाउस पहुॅचे तो छह बज चुके थे। इमली बाबा का चेहरा बीच-बीच में याद आ रहा है- धुर्जटि बाबू की ओर आँख तरेरे, हाथ उठाए दुर्वासा की तरह खड़े हैं। पता नहीं क्यों धुर्जटि बाबू मतिभ्रम के शिकार हो गए? तब हाँ, मेरा मन कह रहा था कि हम घटना का अन्त देख आए हैं, अतः उस पर सोचने से अब कोई लाभ नहीं है। बाबा खुद ही कह चुके हैं कि बालकिशन की मृत्यु नहीं हुई है। भरतपुर के जंगल में क्या दूसरा नाग नहीं होगा? कल ही बाबा के चेले एक दूसरे नाग को पकड़ कर ले आएंगे। 

डिनर के लिए लछमन ने मुर्गे की करी बनाई थी, उसके साथ पूरी और उड़द की दाल । दिन-भर घूमते-फिरते रहने से आदमी की भूख बहुत तेज हो आती है। कलकत्ते में रात में जितना खाता हूँ उसका यहाँ दुगुना खा लेता हूँ। कद नाटा होने से क्या होगा; धुर्जटि बाबू के भोजन की मात्रा भी खासी अच्छी है। लेकिन आज ऐसा लगा जैसे उन्हें भूख है ही नहीं। मैंने जब उनकी तबीयत के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने भी उत्तर न दिया। मैंने कहा, ‘आपको क्या बालकिशन के लिए दुख हो रहा है?” धुर्जटि बाबू ने जवाब तो दिया ज़रूर, मगर उसे मेरे सवाल का जवाब नहीं कहा जा सकता है। पेट्रोमैक्स की ओर घूरते हुए अपनी आवाज को अत्यन्त धीमी और मुलायम बनाकर कहा, “साँप फिस-फिस फिस-फिस कर रहा था…फिस-फिस… कर रहा था।’ 

मैंने हँसकर कहा, ‘फिस-फिस या फोंस-फोंस ?’ आँखों को रोशनी की ओर से बिना हटाए उन्होंने सिर हिलाकर कहा, ‘नहीं, फिस- फिस।… साँप की भाषा, साँप की सिसकारी फिस- फिस- फिस… 

यह कहकर उन्होंने अपनी जीभ की फाँक से साँप की सिसकारी जैसी आवाज बाहर निकाली। उसके बाद कविता लिखने की मुद्रा में सिर हिला हिलाकर कहा, ‘साँप की भाषा, साँप की सिसकारी, फिस-फिस-फिस । बालकिशन का विषम विष फिस- फिस- फिस! यह कन्या चीज है? बकरी का दूध है ?” अन्तिम दो वाक्य अवश्य ही कविता के अंश न थे। यह उन्होंने एक मामूली तश्तरी में रखी पुडिंग के बारे में कहा था । लछमन ने ‘बकरी’ नहीं, सिर्फ दूध शब्द ही सुना था। वह बोला, ‘हॉ बाबू, दूध और अंडा है।’ ब्राउन साहब की कोठी का राज

दूध और अण्डे से पुडिंग बनता है, यह बात कौन नहीं जानता ? धुर्जटि बाबू यों भी स्वभाव से मनमौजी और अधपगले हैं, मगर उनका आज का हाव-भाव ज्यादती जैसा लग रहा था । इस बात को महसूस कर उन्होंने अपने आपको संभाल लिया और कहा, ‘कई दिनों से धूप में बहुत चक्कर काटना पड़ा है… कल से ज़रा सावधानी बरतनी होगी। 

आज कड़ाके की सरदी है, इसलिए खाना खाने के बाद बाहर बैठने के बजाय मैं अपना सूटकेस सहेजने लगा। कल शाम भरतपुर से विदा होना है। आधी रात में माधोपुर में गाड़ी बदलनी है, भोर पाँच बजे मैं जयपुर पहुँच जाऊँगा। मैंने यही योजना बनाई थी। मगर वह योजना कार्यान्वित नहीं हो सकी। मंझले भैया को तार भेजकर सूचना दे दी कि कुछ आवश्यक कारणवश मेरे पहुँचने की तिथि एक दिन आगे बढ़ गई है। ऐसा क्यों हुआ, यही बात अभी बताने जा रहा हूँ। घटनाओं को यथासम्भव स्पष्ट और अविकल रूप में ही प्रस्तुत करने की चेष्टा करूँगा। जानता हूँ, इस घटना पर सभी यकीन नहीं करेंगे। जिस चीज से मैं सबूत पेश कर सकता था, वह अब भी इमली बाबा कुटिया से पचास हाथ दूर पड़ी हुई है। उसके बारे में सोचते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, इसीलिए उस चीज को सबूत के तौर पर अपने हाथ में उठाकर नहीं चल सका। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। खैर, अब घटना के बारे बताऊँ । 

सूटकेस संभालकर मैंने लालटेन की रोशनी कम कर दी और उसे मेज की ओट में रख दिया। उसके बाद रात का लिबास पहनकर जैसे ही बिस्तर पर लेटने जा रहा था कि पूरब तरफ के दरवाजे पर दस्तक पड़ी। उस दरवाजे के पीछे की ओर धुर्जटि बाबू का कमरा है। 

ज्योहीं दरवाजा खोला, उन्होंने धीमी आवाज में कहा, ‘आपके पास फ्लिट वगैरह है? या मच्छर भगाने की कोई दवा?’. मैंने कहा, ‘मच्छर कहाँ से आया? आपके कमरे के दरवाजे और खिड़कियों में जाली नहीं लगी है?” नहीं, ‘फिर?” 

‘फिर भी कोई चीज काटती है।’ ‘उसका आपको पता चलता है?’ हाथ और मुँह में दाग उभरते जा रहे हैं।’ दरवाजे के सामने अँधेरा था। इसलिए उनका चेहरा अच्छी तरह दीख नहीं था । ‘भीतर चले आइए,’ मैंने कहा, ‘देखूं किस तरह का दाग है।’ धुर्जटि बाबू कमरे के अन्दर चले आए। उनके सामने लालटेन रखते ही दाग दीख पड़े। चौकोने कलछौंहे दाग। इस तरह का दाग मैंने इसके पहले नहीं देखा था और देखने पर मुझे अच्छा भी नहीं लगा। मैंने कहा, “अजीब ही तरह की बीमारी हो गई है। एलर्जी से भी ऐसा हो सकता है। कल सवेरे नींद टूटते ही डाक्टर के पास चलेंगे। आप सोने की कोशिश कीजिए। इसके लिए चिन्ता नहीं कीजिए। यह कीड़े के चलते नहीं हुआ है, बात कुछ और ही है। दर्द कर रहा है?” 

‘उहूं।’ 

‘ठीक है। जाइए, सो रहिए ।’ 

धुर्जटि बाबू चले गए और मैं भी बिस्तर पर आकर कम्बल के नीचे घुस गया। रात में बिस्तर पर लेटकर पुस्तक पढ़ने का मैं अभ्यस्त रहा हूँ। यहाँ लालटेन की रोशनी में इसकी सम्भावना नहीं है। सच कहूँ, इसकी जरूरत भी नहीं है। दिन-भर थके रहने के बाद तकिये पर सिर रखते ही दस मिनट के अन्दर आँखों में नींद उतर आती है। 

मगर आज ऐसा नहीं हुआ। किसी गाड़ी की आवाज से तन्द्रा दूर हो गई। साहबों के गले के साथ-साथ एक अजनबी कुत्ते की आवाज सुन रहा हूँ। रेस्टहाउस में कुछ सैलानी आए हैं। डाँट सुनकर कुत्ते ने भौंकना बन्द कर दिया। लगता है, साहब लोग भी शायद कमरे के अन्दर आ गए हैं। पुनः सन्नाटा रेंगने लगा है। बाहर से झींगुर की आवाज आ रही है। इसके अतिरिक्त एक और आवाज आ रही है। मेरे पूरब के कमरे के पड़ोसी अभी तक जगे हैं और न केवल जगे हैं, बल्कि चहल कदमी कर रहे हैं। उनके पैरों की आवाज सुनाई पड़ रही है। हालाँकि दरवाजे के नीचे के छेद से कुछ देर पहले देख चुका हूँ कि लालटेन को या तो बुझा दिया गया है या बगल के बाथरूम के अन्दर रख दिया गया है। वे कमरे के अन्दर चहल कदमी क्यों कर रहे हैं? 

मुझे लगा, वे अधपगले ही नहीं, उससे भी बढ़-चढ़कर कुछ हैं। उनसे मेरी जान-पहचान महज दो दिनों की है। उन्होंने अपने बारे में जो कुछ बताया है,उससे अधिक उनके बारे में मुझे जानकारी नहीं है। दो घण्टे पहले मैंने उनमें का कोई लक्षण नहीं देखा था। दीग और बाधान किले को देखने के समय उन्होंने जिस प्रकार की बातें की थी, उससे पता चला कि इतिहास के बारे में उन्हें खासी अच्छी जानकारी है। इतना ही नहीं, कला के सम्बन्ध में भी उन्हें यथेष्ट जानकारी है और उसकी झलक उनकी बातचीत से मिल रही थी। राजस्थान के स्थापत्य मे हिन्दू और मुसलमान कारीगरों के योगदान की बात उन्होंने उत्साहपूर्वक बताई थी। नः, लगता है उनकी तबीयत खराब है।                                                      मेरी घड़ी का रेडियम डायल तब ग्यारह बजने की सूचना दे रहा था के दरवाजे पर फिर दस्तक पड़ी। अबकी बिस्तर से उठने के बजाय मैंने चिल्ला कर पूछ ,”क्या बात है धुर्जटि बाबू ? स..स….स।                                                    

‘क्या कह रहे हैं?’                                                  स..स…स.. .पता चल गया कि भले आदमी की आवाज रून्ध गई है। भारी मुश्किल में पड़ा।                                            मैंने फिर पूछा, ‘क्या कह रहे हैं, ठीक से कहिए।                    ‘स-स-स सुनिए जरा ।” आखिर मुझे उठना ही पड़ा। दरवाजा खोलते ही उन्होंने इस तरह का सवाल किया कि मुझे ऊब महसूस होने लगी।                                                     ‘अच्छा स-स-स सांप  में क्या दन्त्य स होता है?”।                    ‘जी हाँ। सौंप का अर्थ जब सर्प, स्नेह होता है तो दन्त्य स ही होता है। मैंने अपनी ऊब छिपाने की कोशिश नहीं की।      ‘आपने इसी चीज को जानने के लिए इतनी रात में दरवाजा खटखटाया ? ‘दन्त्य स?”                                                    जी हाँ। सांप का अर्थ जब साँप होता है तो दन्त्य स ही।’।           ‘और तालव्य श?’                                                           ‘यह दूसरी ही चीज है-शाप। उसका अर्थ है…’ ‘हाँ, अभिशाप ।’ ‘थैंकू यू। स-स-स सोइए जाकर।’ उनकी हालत देखकर मुझे तरस आ रहा था। मैंने कहा, ‘आपको बल्कि नींद की दवा देता हूँ। दवा मेरे पास है। खाइएगा?’।                                      ‘नहीं। श-श-श शीतकाल में यों ही नींद आ जाती है। स-स-स सिर्फ श-श शाम में स-स सूर्यास्त के स-स समय..…. मैंने उन्हें टोका, ‘आपकी जीभ में कुछ हो गया है क्या? बातें क्यों अटक जाती है? जरा अपना टार्च दीजिए तो। उनके साथ में भी उनके कमरे के अन्दर गया। टार्च ड्रेसिंग टेबल पर पड़ा था। उसे जलाकर मैने उनके मुँह के सामने किया और उन्होंने मुँह बा कर जीभ बाहर निकाल दी। इसमें सन्देह नहीं कि जीभ में कुछ-न-कुछ हुआ है। एक पतला-सा लाल दाग जीभ के सिरे से लेकर बीच तक चला गया है। ‘इसमें भी कोई दर्द नहीं है?”              नहीं।’  फ्रींस एक भयानक कहानी                                       उन्हें किस बीमारी ने जकड़ लिया है। यह बात मेरी समझ के परे की चीज है। अब मेरी आँखें उनके पलंग की तरफ गईं। बिस्तर का रंग-ढंग देखकर समझ में आया, अब तक वे पलंग पर लेटे नहीं हैं। मैंने रूखे स्वर में कहा, ‘आप जब लेट जाइएगा तभी मैं अपने कमरे में जाऊँगा। मैं हाथ जोड़कर अनुरोध करता हूँ कि इसके बाद दरवाजा नहीं खटखटाइएगा। कल ट्रेन में सो नहीं पाऊँगा, इसीलिए आज रात सो लेना चाहता हूँ।’ 

मगर उनमें पलंग की तरफ जाने का कोई आग्रह नहीं दीख पड़ा। लालटेन बाथरूम में रखी हुई है, इसलिए कमरे में रोशनी नहीं के बराबर है। बाहर पूनम का चाँद मुस्करा रहा है। उत्तर दिशा की खिड़की से चाँदनी आकर फर्श पर लोट रही है, उसी की रोशनी में धुर्जटि बाबू दिखाई पड़ रहे हैं। वे स्लींपिंग ड्रेस पहनकर खड़े हैं और बीच-बीच में होंठों की फाँक से सिसकारी जैसी आवाज निकाल रहे हैं। आने के समय मैंने अपने बदन पर कम्बल लपेट लिया था। मगर धुर्जटि बाबू के बदन पर एक भी गरम कपड़ा नहीं है। कहीं धुर्जटि बाबू सचमुच ही किसी बीमारी के चक्कर में फँस जाएँ तो उन्हें छोड़कर मेरा यहाँ से जाना मुश्किल है। विदेश के कोई बंगाली यदि मुसीबत में फंस जाए तो बंगाली होने के नाते उसे छोड़कर जाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। मैंने जब एक बार उनसे सोने को कहा और मेरे कहने का कोई नतीजा न निकला तो सोचा, हाथ पकड़कर जोर जबरन लिटा देने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। अगर वे अबोध शिशु बनते हैं तो मुझे बड़े-बुजुर्गों की भूमिका निभानी ही होगी। मगर उनका हाथ पकड़ते ही मुझमें एक ऐसी प्रतिक्रिया हुई कि मैं तीन कदम पीछे हट गया । 

धुर्जटि बाबू का बदन बर्फ की तरह ठंडा है। जीवित आदमी का शरीर इतना ठंडा हो सकता है यह बात मेरी कल्पना के बाहर है। मेरी हालत देखकर धुर्जटि बाबू के होंठों के कोने में एक हंसी खेल गई। अब वे अपनी पीली आँखों से मेरी ओर घूरते हुए मुस्करा रहे हैं। मैंने रुंधी आवाज में कहा, ‘आपको क्या हुआ है, बताइए।’ 

धुर्जटि बाबू मेरी ओर से अपनी आँखें नहीं हटाते हैं।            अगले व अंतिम भाग के लिए प्रतीक्षा करें। Thanks for reading. 🙏🙏

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