College Diary.

 आजकल मैं अपनी College life enjoy कर रही हूँ रोज College पहुंचते-पहुंचते और वापस आते-आते मैं इतनी बातें ,इतने सबक सीख लेतीं हूँ जितने मैं क्लॉस में नहीं सीख पाती ‌।

हॉं मैं सच कह रही हूँ भीतरी दुनिया से जिसमेें हमें एक पहुँची हुई पद्धति के द्वारा डाला जाता हैं उससे ज्यादा मैंने उस बाहरी दुनिया से सीखा है जो हकीकत की बुनियाद पर बड़े वर्गों के समाज के मुख पर  तमाचा जड़ती है ,मैं ये सब उस दुनिया से सीख रही हूँ जो गरीबी मुक्त भारत को धता बता रहें हैं। हॉं ये सब मैं जिन्दग़ी से सीख रहीं हूँ।

जिन्दग़ी life जिसे मैंने पहले ही  रेखांकित किया है मैं उसे ही सीख रहीं हूँ कुछ ऐसे लोगों से जो जिन्दग़ी का मतलब तो नहीं जानते थोड़ा सा भी मगर उसे जीते चले जा रहे हैं ।

मैं कालेज आने-जाने के दौरान रोज ही बहुत से बेघर बरोजगार  लोगों को देखती हूं इसमें तो मुझे कोई हैरानी नहीं हुई मगर हैरानी तब हुई जब इन्हे शान्त निश्चित देखा।                            जिनके साथ जिन्दग़ी इतना भयानक मजाक कर रहीं हो वो ऐसे हॅंस बोल भी सकतें हैं बिना जिन्दग़ी से कोई शिकायत किए ये पहली बार मैंने देखा । पहली बार समझी मैं कि जिन्दग़ी से बिना बहस किए , बिना शिकायत किए , बिना जिंदगी को दोष दिए भी जिन्दग़ी जी सकती हैं । 

मगर शायद ऐसी भारी – भरकम जिन्दग़ी जिसे ढोते-ढोते आदमी दब जाता हैं और उसके बाद उसके अन्दर का इन्सान मर जाता है ।

 तो फिर कौन हैं ये सड़कों पर बसे लोग?                           शायद    जिंदा लाशें जिन पर न ‌मौसम का असर होता  है न किसी गम का।

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