बाल दिवस विशेष: सदानंद की छोटी सी दुनिया A psychological story

 आज मेरा मन खुश है, इसलिए सोचता हूँ, तुम लोगों को राज की बात बता दूँ।जानता हूँ, तुम लोग मेरी बात पर यकीन करोगे। तुम लोग इन लोगों के जैसे नहीं हो । इन लोगों का ख्याल है, मेरी सारी बातें झूठी और बनावटी हैं। यही वजह है, मैं इन लोगों से अब बातचीत ही नहीं करता। अभी दोपहर है, इसलिए ये लोग मेरे कमरे में नहीं हैं। तीसरे पहर आएँगे। अभी यहाँ मैं हूँ और मेरा मित्र लालबहादुर है। लालबहादुर सिंह । उफ्, कल उसने मुझे कितनी चिन्ता में डाल दिया था। मेरा यह खयाल था ही नहीं कि वह फिर लौटकर आएगा । वह बड़ा ही अक्लमन्द है, इसलिए भागकर उसने अपनी जान बचा ली। कोई दूसरा होता तो अब तक मर कर भूत हो चुका होता । लो, मित्र का नाम तो बता दिया मगर अपना नाम बताया ही नहीं। मेरा नाम है सदानन्द चक्रवर्ती। सुनने से दाढ़ीवाले बूढ़े जैसा क्या नहीं लगता हूँ? दरअसल मेरी उम्र तेरह साल है। नाम यदि बूढ़े जैसा है तो मैं क्या करूँ? मैंने खुद तो अपना नाम रखा नहीं। रखा है मेरी दादी अम्मा ने। इतना जरूर है कि उन्हें अगर पता होता कि नाम के कारण मुझे परेशानी में पड़ना होगा तो वे मेरा नाम कुछ और ही रखतीं। उन्हें यह मालूम नहीं था कि लोग मेरे पीछे पड़ जाएँगे और कहेंगे, ‘तेरा ही नाम सदानन्द है न?? काश! उनमें थोड़ी भी अक्ल होती! सियार की तरह सिर्फ खों-खों कर हँसने से ही क्या खुशी हासिल होती है? सभी तरह की खुशियों में क्या हँसा जाता है या हँसना उचित है? जैसे, मान लो तुम बिना कुछ सोचे-विचारे जमीन में एक लकड़ी गाड़ देतेब्हो। एक फतिंगा उड़ता हुआ आता है और उस लकड़ी के ऊपर बैठ जाता है। यह तो बहुत मजेदार बात है। मगर इसको देखकर अगर तुम हो-हो कर हँसने लगते हो तो लोग तुम्हें पागल ही कहेंगे । इसी तरह के मेरे एक पगले दादाजी थे। मैंने उन्हें देखा नहीं है, मगर बाबूजी से सुना है कि वे बेवजह हँसा करते थे । आखिर में जब उनका पागलपन बहुत बढ़ गया तो बाबूजी, छोटे चाचा और अविनाश चाचा ने मिलकर उन्हें साँकल से बाँध दिया। उस समय भी वे इतना हँसते थे, इतना कि क्या कहूँ !     

                                       जानते हो, असली बात क्या है? मुझे जिन चीजों में दिलचस्पी है, ज्यादातर लोगों के ध्यान में वे चीजें आती ही नहीं। अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे ही मैं मजेदार चीजें देखता रहता हूँ बीच-बीच में खिड़की के रास्ते से कमरे के अन्दर सेमल का बीज उड़ता चला आता है। उसमें लम्बा रोआँ रहता है और वह रोआँ इधर-उधर उड़ता रहता है। वह बड़ी ही मजेदार चीज है। हो सकता है, वह एक बार तुम्हारे चेहरे के पास उड़ता हुआ आए। तुम जैसे ही एक बार फूँक मारोगे वह झट से उड़कर शहतीर की तरफ चला जाएगा। और खिड़की पर अगर एक कौवा आकर बैठे तो उधर देखने पर तुम्हें लगेगा कि यह तो सर्कस का मसखरा है। कौवा जैसे ही आकर बैठता है, मैं हिलना-डुलना बन्द कर देता हूँ और तिरछी निगाहों से उसका तमाशा देखता रहता हूँ। इतना जरूर है कि अगर कोई पूछे कि मुझे सबसे ज्यादा मज़ा किसमें मिलता है तो मैं कहूँगा चींटी में सिर्फ़ मज़ा कहना गलत होगा। कारण…न, कारण अभी नहीं बताऊँगा। पहले ही अगर आश्चर्यजनक बातें बता दूँ तो सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। इससे तो बेहतर यही है कि शुरू से ही बताऊँ । आज से लगभग एक साल पहले मैं बुखार की चपेट में फँस गया था। यह कोई नई चीज हो, ऐसी बात नहीं। मुझे अकसर बुखार आ जाया करता था। सर्दी और बुखार माँ कहती, सुबह-शाम मैदान में भीगने और भीगी घास और जमीन पर बैठे रहने के कारण यह सब होता है। हर बार की तरह इस बार भी बुखार के शुरुआत के दिनों में अच्छा ही लग रहा था। ठंडा-ठंडा, बदन में ऐंठन और सुस्ती का भाव। उसके साथ स्कूल न जाने का मजा तो है ही। बिस्तर पर लेटा हुआ खिड़की के बाहर तर्री के एक वृक्ष पर गिलहरी को खेलते हुए देख रहा था। तभी माँ ने आकर एक कसैली दवा पीने को दी। मैंने भले लड़के की तरह दवा पीकर गिलास से पानी के कई घूँट हलक से नीचे उतारे और बाकी पानी को कुल्ली कर खिड़की के बाहर फेंक दिया। माँ खुश होकर कमरे से बाहर चली गई । उसके बाद चादर को खींचकर भलीभाँति बदन पर डाला फिर तकिये को बगल में दबाकर लेटने जा ही रहा था कि एक चीज पर मेरी नजर गई। देखा, कुल्ली का थोड़ा-सा पानी खिड़की पर पड़ा हुआ है और उस पानी में एक छोटी काली चींटी गोते लगा रही है। यह बात मुझे इतनी अद्भुत लगी कि अच्छी तरह देखने के ख्याल से मैं अपनी आँखों को चींटी के बिलकुल करीब ले गया।देखते-देखते मुझे अचानक लगा। वह चींटी चींटी नहीं, कोई आदमी है। और न केवल आदमी बल्कि मुझे ऐसा लगा कि झन्टू के बहनोई साहब मछली पकड़ने गए हैं और फिसलकर कीचड़ में गिर पड़े हैं, अच्छी तरह तैरना न जानने के कारण लगा रहे हैं और हाथ-पाँव पटक रहे हैं। याद है, झंदू के बहनोई साहब को झंटू के बड़े भैया और नौकर नरहरि ने बचाया था। जैसे ही मुझे यह बात याद आई, मेरे मन में इच्छा जगी कि चींटी को बचा लूँ।

बुखार की हालत में ही झट से बिस्तर से उठकर खड़ा हो गया और बगल के कमरे में प्रवेश किया। वहाँ पिताजी के राइटिंग पैड से जरा-सा ब्लौटिंग पेपर फाड़कर एक ही दौड़ में अपने कमरे में वापस चला आया और छलाँग लगाकर ब्लॉटिंग पेपर के टुकड़े को पानी पर रख दिया। रखने के साथ ही ब्लौटिंग पेपर ने पानी को सोख लिया । जान बचने के कारण चींटी एक क्षण के लिए हक्की-बक्की रह गई, एक-दो बार इधर उधर मुड़ती हुई सीधी नाली में चली गई। उस दिन फिर कोई चींटी नहीं आई। दूसरे दिन मेरा बुखार बढ़ गया। दोपहर में माँ काम-धाम खत्म कर कमरे में आई और बोलीं, “खिड़की की ओर फटी-फटी आँखों से क्यों ताक रहे हो? इतना बुखार है। चाहे नींद आए, चाहे न आए, आँख बन्द कर चुपचाप लेटे रहो।” माँ को खुश करने की खातिर मैंने आँखें बन्द कर लीं, मगर उसके जाते ही आँख खोलकर नाली की तरफ ताकने लगा। तीसरे पहर सूरज जब पेड़ के पीछे चला गया, एक चींटी को नाली के छेद से झांकते हुए देखा। अचानक वह बाहर निकल आई और खिड़की पर चहल कदमी करने लगी। सभी चींटियाँ हालाँकि एक जैसी होती हैं, फिर भी मुझे न जाने क्यों ऐसा महसूस हुआ कि यह कल वाली ही वह चींटी है जो मुसीबत में फंस गई थी। मैंने चूँकि मित्र का काम किया था इसलिए आज हिम्मत बाँधकर मेरे पास आई है।

मैंने पहले से ही योजना बना ली थी। भंडारघर से एक चम्मच चीनी ले आया था और उसे कागज में मोड़कर अपने तकिये के नीचे रख दिया था। उससे एक बड़ा दाना निकालकर मैंने खिड़की पर रख दिया।न्चींटी अचानक ठिठककर खड़ी हो गई। उसके बाद धीरे-धीरे चीनी के दाने के पास आकर उसे चारों तरफ़ से छू-छाकर देखा। उसके बाद न जाने क्या सोचा और मुड़कर नाली के अन्दर चली गई। मैंने सोचा, वाह जी वाह, खाने के लिए इतनी अच्छी चीज दी और हजरतन्उसे छोड़कर लापता हो गए। फिर आने की जरूरत ही क्या थी? कुछ देर बाद डाक्टर साहब आए। मेरी नाड़ी और जीभ देखी, छाती और पीठ की स्टेथस्कोप से परीक्षा की। सब कुछ देखने-सुनने के बाद कहा कि मुझे कसैली दवा और पीनी है। दो दिन के बाद ही बुखार उतर जाएगा। सुनकर मेरा मन खराब हो गया। बुखार उतरने का मतलब है स्कूल जाना और स्कूल जाने का मतलब है दोपहर की बरबादी। दोपहर को ही चींटी मेरी खिड़की से होकर आती है। खैर, डाक्टर बाबू के कमरे से जाते ही मैंने फिर से खिड़की की तरफ देखना शुरू कर दिया और मेरा मन फिर खुशियों से भर उठा। अबकी एक नहीं, अगनित चींटियाँ कतार बाँधकर नाली से होकर अन्दर आ रही हैं। सामने की चींटी मेरी वही जानी-पहचानी चींटी है। उसी ने अन्य चींटियों के पास खबर पहुँचाई होगी और अब सबको अपने साथ लेकर आई है। थोड़ी देर तक गौर से देखने के बाद चींटी की बुद्धि का नमूना दिखाई पड़ा। सभी चींटियों ने मिलकर चीनी के दाने को ठेलना शुरू किया और ठेलती हुई नाली की तरफ ले गईं। वह इतनी मजेदार बात थी कि बिना देखे समझ में नहीं आ सकती। मन-ही-मन सोचने लगा, मैं अगर चींटी होता तो अवश्य ही सुनता कि वे कह रही हैं- मारो जवान, हैया और भी थोड़ा हैया चले इंजिन, हैया ।

बुखार उतरने के बाद शुरू में कई दिनों तक स्कूल में बहुत खराब लगता रहा। क्लास मैं बैठा-बैठा सिर्फ अपनी खिड़की की बात सोचता रहता था। पता नहीं, कितनी तरह की चींटियाँ वहाँ आ-जा रही होंगी। इतना ज़रूर है कि आने के समय हर रोज मैं खिड़की पर चीनी के दो-तीन दाने रख आता था। तीसरे पहर जब मैं लौटकर जाता तो उन दानों को वहाँ से लापता पाता था । क्लास में मैं ज्यादातर बीच की एक बेंच पर बैठा करता था। मेरी बगल में शीतल बैठता था। एक दिन मुझे जाने में देर हो गई और वहाँ पहुँचने पर शीतल की बगल में फणी को बैठा हुआ पाया। क्या करता, पीछे दीवार की तरफ एक सीट खाली थी, उसी पर जाकर बैठ गया।।टिफिन के पहले इतिहास का क्लास था। हाराधन बाबू अपनी महीन आवाज में हैनिबेल की वीरता की कहानी सुना रहे थे। हैनिबेल ने कार्थेज से सेना लेकर आल्पस पर्वत पार किया था और उसके बाद इटली पर चढ़ाई की थी। सुनते-सुनते मुझे लगा, हैनिबेल की सेना इसी कमरे में है और मेरे निकट से होकर चली जा रही है। इधर-उधर ताकते ही पीछे की दीवार पर मेरी आँखें टिक गईं। देखा, चीटियों की एक लम्बी कतार दीवार से नीचे उतर रही है। ठीक सेना की तरह काली-काली, छोटी-छोटी अनगिनत चींटियों की कतारें लगातार एक ही ढंग से चली जा रहीं और रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं। टिफिन की घंटी बजते ही मैं बाहर निकल आया-क्लास के पीछे की तरफ जाकर उस दरार को ढूँढ़ निकाला। देखा, चींटियाँ दीवार की दरार से निकल कर घास के अन्तराल से सीधे अमरूद के दरख्त की ओर जा रही हैं चींटियों की कतार का अनुसरण करते हुए जब पेड़ के तने के पास पहुँचा तो जिस चीज पर नजर पड़ी उसे किले के अलावा क्या कहा जाए। देखा, किले की तरह ही ऊँचा मिट्टी का एक टीला है, उसके नीचे की तरफ एक फाटक। और उसी फाटक से कतार बाँधकर चींटियों की सेना अन्दर प्रवेश कर रही है। मेरे मन में इच्छा जगी कि किले के अन्दरूनी हिस्से को ज़रा देख लूँ। जेब में जो पेंसिल थी, उसी की नोक से मैंने टीले के ऊपर की मिट्टी को धीरे-धीरे हटाना।शुरू किया। शुरू में कुछ भी न मिला, परन्तु उसके बाद जिस चीज पर मेरी नजर पड़ी उसने मुझे आश्चर्य में डाल दिया। किले के अन्दर छोटे-छोटे अनेक खाने बने हैं और एक खाने से दूसरे खाने के लिए अनगिनत सुरंगें बिछी हैं कितने आश्चर्य की बात है! इन छोटे-छोटे हाथ-पैरों से इस तरह के मकान इन लोगों ने कैसे बनाए?।इनमें इतनी अक्ल कहाँ से आई? क्या इन लोगों के भी स्कूल और शिक्षक हैं? ये।लोग भी क्या लिखते-पढ़ते हैं, हिसाब बनाते हैं, तसवीर बनाते हैं और कारीगरी सीखते।हैं? फिर क्या सिवाय चेहरे के आदमी और इनमें कोई अन्तर नहीं है? शेर, भालू, हाथी, घोड़ा वगैरह अपने-अपने घर अपने हाथों से कहाँ बना पाते हैं? यहाँ तक कि पालतू कुत्ते भी नहीं। चिड़ियाँ जरूर खोंता बनाती हैं। मगर उनके एक खाँते में कितनी चिड़ियाँ वास कर सकती हैं? चिड़ियाँ क्या इन लोगों के जैसा किला बना पाती हैं जिसमें हजारों चिड़ियाँ एक साथ वास कर सकें?।किले का कुछ हिस्सा टूट जाने के कारण चीटियाँ में खलबली मच गई थी।।मुझे बड़ा दुख हुआ। मन-ही-मन सोचा, इन लोगों की मैंने हानि की है तो अब भलाई।भी करनी चाहिए। ऐसा यदि नहीं करूँगा तो चींटियाँ मुझे अपना दुश्मन समझ लेंगी।और मैं उनका दुश्मन नहीं होना चाहता। असल में मैं उनका मित्र हूँ।।इसलिए दूसरे दिन मैंने उस सन्देश का आधा भाग, जिसे माँ ने मुझे खाने।को दिया था, सखुए के एक पत्ते में मोड़कर जेब में रख लिया।।स्कूल पहुँचने पर, घंटा बजने के पहले ही सन्देश के उस टुकड़े को बांबी के।पास रख दिया। बेचारों को भोजन की तलाश में बहुत दूर जाना पड़ता है। आज घर से बाहर निकलते ही उन्हें अपने सामने भोजन का पहाड़ दीख पड़ेगा। यह क्या।कोई कम उपकार है? इसके कुछ दिन बाद ही गरमी की छुट्टी हुई और चींटियों से मेरी दोस्ती और भी गहरी हो गई।

चींटियों को देख-देखकर उनके विषय में जो सब आश्चर्यजनक बातें मालूम हुई, बीच-बीच में मैं बड़े-बुजुर्गों को वही बातें बताता था। मगर वे मेरी बात पर ध्यान ही नहीं देते थे। सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे उस वक्त आता जब वे मेरी बातें।हँसकर उड़ा देते। इसलिए एक दिन तय किया कि अब किसी को कुछ भी न बताऊंगा। जो करने का होगा खुद ही करूँगा, जो कुछ जानकारी प्राप्त होगी, उसे अपने तक ही सीमित रखूँगा ।

एक दिन एक घटना घट गई। तब दोपहर का वक्त था। मैं झंदु के मकान की दीवार पर बनी माटे की एक बांबी के पास बैठा था और माटों का खेल देख रहा था। बहुत से आदमी कहेंगे कि माटे की बाँबी के पास अधिक देर तक बैठा नहीं जा सकता। क्योंकि माटा काट लेता है। यह बात सही है कि इसके पहले माटा मुझे काट चुका है, मगर कुछ दिनों से देख रहा हूँ कि अब वह मुझे नहीं काटता। मैं निश्चितता के साथ बैठा हुआ माटों को देख रहा था कि तभी छिकु वहाँ आ धमका।।छिकु के बारे में इसके पहले मैंने कुछ भी न बताया है। उसका अच्छा नाम श्री कुमार है। वह हमारे ही दर्जे में पढ़ता है, मगर हम लोगों से काफी बड़ा है, क्योंकि दाढ़ी-मूँछें उग आई हैं। छिकु सिर्फ लीडरी करता रहता है। यही वजह है कि कोई उसे प्यार नहीं करता। मैं भी नहीं लेकिन ऐसा होने पर भी मैं उससे कभी उलझता नहीं, क्योंकि मुझे मालूम है कि उसकी देह में बहुत ताकत है।न्मुझे देखकर छिकु बोला, ‘अरे बेवकूफ, यहाँ बैठकर किसका इन्तज़ार कर रहा मैंने छिकु की बातों पर ध्यान नहीं दिया, मगर देखा वह मेरी ओर ही आ रहा है। मैं माटों की तरफ देखने लगा। छिकु ने मेरे पास आकर पूछा, ‘क्या हो रहा है? हाव-भाव अच्छा नहीं लग रहा है।’ मैंने अब छिपाने की कोशिश नहीं की और सच्ची बात बता दी।न्सुनकर छिकु दाँत पीसने लगा और बोला, ‘माटा देख रहे हो इसका मतलब? इसमें देखने की क्या चीज है? चींटी क्या तुम्हारे घर में नहीं है कि यहाँ देखने पहुँच गए?’ मुझे बड़ा गुस्सा आया। मैं कुछ भी करूँ, इससे तुम्हारा क्या बिगड़ता है? हर चीज में नाक घुसेड़ता है और लीडरी किए चलता है ! मैंने कहा, ‘देखना मुझे अच्छा लगता है, इसीलिए देखता हूँ। चींटी का रहस्य तुम्हारी समझ में नहीं आएगा। तुम्हें जो अच्छा लगे जाकर वही करो। यहाँ परेशान करने क्यों आ गए ? ‘ मेरी बात सुनकर छिकु बिलाव की तरह झुंझला उठा और बोला, ‘ओह, देखना अच्छा लगता है चींटी देखना अच्छा लगता है? फिर लो, देखो!’ यह कहकर छिकु ने लाठी की चोट से माटे की बाँबी को तोड़कर बरबाद कर दिया। और उस चोट से कम-से-कम पाँच सौ चींटियों की जान चली गई। लाठी मारकर छिकु हंसता हुआ वहाँ से चला जा रहा था। तभी मेरे सिर पर भूत सवार हो गया ।

मैंने छलांग लगाई और छिकु के बालों को कसकर पकड़ लिया और फिर उसके सिर को झंदु की दीवार से चार-पाँच बार जोरों से टकरा दिया ।         – सत्यजित रॉय

            Continued…..

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