औरत के हर कपड़े से मर्द को ऐतराज क्यों हैं?

 कुछ वक्त पहले प्रोग्रेसिव सोच के कुछ समझदार एवं जागरूक लोगों को इस बात पर बड़ा ऐतराज था कि भारत जैसे विकासवादी देश में महिलाओं पर बुरका या हिजाब थोपना बिलकुल भी सही नहीं हैं। आज जब दूसरे देश चाँद पर पहुँच रहें हैं उस वक्त हम महिलाओं को बुर्के में कैद रखने की कोशिश कर रहें हैं जो कहीं न कहीं ये हमारी रुढ़िवादी सोच को दिखाता हैं। हमें महिलाओं को स्वतन्त्र रहने देना चाहिए एवं उन्हें उनके हिसाब से कपड़ो का चुनाव करने देना चाहिए। अब यही बुद्धिमान लोग दीपिका की बिकिनी देख कर तुरंत “संस्कृति बचाव”अभियान के अगुवा हो गयें हैं। वहीं लोग जो बोल रहें थे कि औरत जो भी पहने उसकी मर्जी होनी चाहिए। वहीं लोग अब थिएटर फूकने की धमकी दे रहें हैं जहाँ-जहाँ पठान मूवी लगी होगी। अब बताइए क्या कहा जाए ऐसे दोगले आदमियों को? जी हाँ, सिर्फ आदमियों को ही दोगला कहा मैंने क्योंकि इन औरतों को कुछ भी कह डालो उन्हें तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता आज भी इंडिया में आपको ऐसे तमाम घर मिल जाएँगे जहाँ औरतें अपनी मर्जी से नहीं,आदमी की मर्जी से कपड़े पहनती हैं,जैसे शरीर उनका नहीं बल्कि आदमी का हैं। 

  राजनीति का बेशर्म रंग                                               खैर तो बात चल रही थी बिकिनी की….सॉरी…सॉरी बिकनी की नहीं,भला बिकिनी भी कोई ऐसी चीज़ हैं जिस पर बात चलानी चाहिए ये तो राष्ट्रीय मुद्दा हैं जिस पर संसद में तीखी बहस की जानी चाहिए ताकि हमें पता चल सके कि पुरुषों के हिसाब से हमारे देश की संस्कृति सही दिशा में जा रही है या नहीं। मैं तो बात कर रही थी आदमियों की प्रोग्रेसिव सोच की जो बुरका देख के अति तीव्र गति से विकासवाद की मृत्यु पर शोक जताने को आतुर हो गए थें अब वो किसी की छोटी ड्रेस देख के मर्यादा की मृत्यु पर हाय-हाय कर रहें हैं। ये देख के मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर चल क्या रहा हैं मेरे देश के पुरुषों के दिमाग में? चाहते क्या हो भाई? हम कपड़े पहने कि ना पहने या पहने भी तो आपसे पूछ कर पहने कि आज क्या पहनूं?कल क्या पहनूं ? अंदर क्या पहनूं?बाहर क्या पहनूं? एक काम करती हूँ एक आईडिया देती हूँ आप मर्दों को जिससे आप रोज़ रोज़ की दिक्कत से बच जाएंगे। आप क्या कीजिए जिस तरह औरतें अपनी रसोई में सातों दिन का मेन्यू बना के टांग देतीं हैं, सोमवार दाल-चावल, सब्जी रोटी,मंगलवार- रायता,करेला फुल्के, चपाती चावल ,बुधवार…… ऐसे करके आप भी एक लिस्ट बना के अपने घर की औरतों के कमरे में टांग दीजिये। सोमवार- सलवार-कुर्ता,मंगलवार- साड़ी, बुधवार…. ऐसे करके पूरा रूटीन ही सेट कर दीजिये उनके कपड़ो का।                  क्या हैं ना कि इससे रोज़ का रोज़ बहस के मुद्दे नहीं बचेंगे इससे आप लोग आपने काम पर भी ध्यान लगा पाएंगे क्योंकि हफ्ते के तीन दिन तो आपके लड़कियों के कपड़े ही क्रिटीसाइज करने में ही निकल जातें हैं, नेता लोग बेचारे बयान देते-देते, तू-तू-मैं-मैं करतें-करतें,लोगों को भड़काते-भड़काते थक जातें हैं,सेंसर बोर्ड अपनी तौहीन पर शर्मिंदा होता है और संसद बेचारी फिल्मों में क्या होना चाहिए क्या नहीं?इसी पर बहस करती रह जाती है। जब एक रूटीन सेट हो जाएगा तो शायद इस देश के महान कोटि के लोग कुछ सामान्य काम करने की ओर ध्यान दे सकेंगे।

ठीक आईडिया दिया ना मैंने आपको?इससे आप जिम्मेदार,समझदार पति या भाई हो जाएँगे ना? काश ये आईडिया रणवीर सिंह भी फॉलो कर पाता तो आप लोगों से उसे गालियां तो नहीं पड़ रही होतीं। नाकारा,बेशर्म,बीवी से डरने वाला पति और भी ना जाने कितनी गन्दी-गन्दी गालियां दे रहें हैं आप में से अधिकतर उसे क्योंकि उसने अपनी बीवी को शार्ट ड्रेस पहनने से नहीं रोका। हाँ भाई ठीक ही होगी आप लोगों की सोच क्योंकि मर्दों की सारी मर्दानगी तो बीवी के कपड़ो से ही होती हैं। खुद चाहे बिना कपड़ो के घूमो पर अपनी पत्नी को जरूर लबादा पहना दो। अरे लेकिन लबादा पहनने से भी क्या होगा कहीं आपकी विकासशील सोच(जिसमें थोड़ा भी विकास नहीं हुआ है ) फिर से जग गई तो? 

इन सब बातों को हलके में लिखने के बाद मेरे मन में बस एक भारी प्रश्न हैं, क्यों भाई?किसलिए?कुछ मिल जाता हैं इस तरह पूरे देश को घर के बाहर का चबूतरा बना के औरतों की तरह प्रपंच करके?कुछ काम की बातें नहीं हैं आप लोगों के पास कभी बुर्का, कभी साड़ी तो कभी बिकिनी, औरतों के कपड़ो के अलावा भी राजनीति हैं। औरतें नहीं आती आपके कपड़ो पर राय देने कि आज जीन्स नहीं पजामा पहनो वो इल्जाम नहीं लगाती आप पर जब संस्कृति खराब करने का जब आप शॉर्ट्स पहन के निकल जाते हैं घूमने। इसीलिए आप भी औरतों के कपड़ो पर ना ही बोला करें तो अच्छा लगेगा आप पर। हमें आता हैं कपड़े पहनना जैसे आप को आता हैं इसीलिए फ्री की राय बांटकर ज्यादा रायचन्द बनने की कोशिश ना करें,वक्त के हिसाब से चलें,बाहर से ही नहीं अंदर से भी प्रोग्रेसिव बने क्योंकि देश और आपका घर औरतों के कपड़ो से नहीं बल्कि एक हेल्दी थिंकिंग और हैप्पी लिविंग से चलेगा। आप कोशिश कीजिए लड़कियों की ड्रेसिंग को कोई रेट ना देने की और उनके हिसाब से कपड़े पहनने की मैं मानती हूँ कि कुछ दिन बहुत खाली खाली लगेगा आपको ऐसा लगेगा की कोई काम ही नहीं हैं आपके पास लेकिन यकीन रखिए बाद में आपको आदत हो जाएगी लड़कियों को कपड़े के लिए ना टोकने की जोकि काफी अच्छी आदत है।

(ब्लॉग का उद्देश्य किसी की “सोच” को आहत करने का नहीं हैं फिर भी अगर हो जाए तो 🙏)

Thanks for reading 🙏🙏

1 thought on “औरत के हर कपड़े से मर्द को ऐतराज क्यों हैं?”

Leave a comment