दूसरा आदमी- मानव कौल

 मैं खाना बनाने की तैयारी करने लगा। पीछे से माँ ज़िद करने लगीं ‘नहीं, खाना मैं बनाऊँगी’। इस युद्ध में जीत माँ की ही होनी थी पर मैं ज़िद करके टमाटर, प्याज़, हरी मिर्च काटने लगा। 

“आप इतनी दूर से सफ़र करके आई हो । खाना आप ही बनाना, मैं बस तैयारी कर देता हूँ।’ माँ चुपचाप बालकनी में जाकर खड़ी हो गईं। उन्हें मुझे इस तरह देखने की आदत नहीं है। कई साल पहले जब वह मुझसे मिलने आती थीं तो अनु साथ होती थी। तब मैं शादीशुदा था। माँ अनु को बहुत पसंद करती थीं। शायद इतने साल माँ इसलिए मुझसे मिलने नहीं आईं। 

“घर बहुत छोटा है, पर सुंदर है।” माँ ने कहा । मैं चुप रहा। सब काट लेने के बाद मैं भी बालकनी में जाकर खड़ा हो गया। पीछे जंगल था । हरियाली दिखती थी। माँ कुछ और तलाश रही थीं। उनकी निगाहें कहीं दूर किसी हरे कोने से जिरह कर रही थीं। मैं बग़ल में आकर खड़ा हो गया, इसकी उन्हें सुध भी नहीं लगी। माँ लंबाई में बहुत छोटी थीं, मेरे कंधे के भी नीचे कहीं उनका सिर आता था। मेरा भाई और मैं मज़ाक़ में कहा करते थे कि अच्छा हुआ हमारी हाइट माँ पर नहीं गई, नहीं तो हम bonsai human लगते । माँ की आँखों के नीचे कालापन बहुत बढ़ गया था। वह बहुत बूढ़ी ‘ रोक सकता हूँ कुछ ? उनका बूढ़ा होना न सही पर उनके लग रही थीं। क्या आँखों के नीचे का कालापन, वह ? पता नहीं कितनी सारी चीजें हैं जिनका हम कुछ भी नहीं कर सकते। बस मूक दर्शक बन देख सकते हैं। सब होता हुआ। सब घटता हुआ, धीरे-धीरे । मेरी इच्छा हो रही थी माँ के गालों पर हाथ फेर दूँ। उनकी झूल चुकी त्वचा को सहला दूं। कह दूं कि मुझसे नहीं हो सका मा, कुछ भी नहीं। पर इस पूरी प्रक्रिया में वह रो देतीं और मैं यह क़तई नहीं चाहता था। पिछले कुछ सालों में मैंने माँ के साथ अपने सारे संवादों में ‘मैं खुश हूँ’ की चाशनी घोली है। उन्हें मेरे अकेलेपन, ख़ालीपन की भनक भी नहीं लगने दी, जिसकी अब मुझे आदत हो गई है। अब लगता है कि इस ख़ालीपन, अकेलेपन के बिना मैं जी ही नहीं सकता हूँ। ‘इस बालकनी में तुम कुछ गमले क्यों नहीं लगा लेते ?” इस बीच माँ की आवाज़ कहाँ से आई मुझे पता ही नहीं चला। उनके बूढ़े झुर्रियों वाले गाल बस हल्के से हिले थे । वह अभी भी मुझे नहीं देख रही थीं। 

“इच्छा तो मेरी भी है पर यह किराये का घर है, पता नहीं कब बदलना पड़े और यूँ भी मेरा भरोसा कहाँ है! कभी ज़्यादा दिन के लिए कहीं चला गया तो…।” माँ मेरे आधे वाक्य में भीतर चली गईं। मेरे शब्द टूटे, झड़ने लगे, गिर पड़े और मैं चुप हो गया। माँ ने ख़ुद को खाना बनाने में व्यस्त कर लिया। 

मेरे और माँ के बीच संवाद बहुत कम होते गए थे। पहले ऐसा नहीं था, पहले हम दोनों के बीच ठीक-ठीक बातचीत हो जाती थी और विषय भी एक ही था हमारे पास- अनु। पर अब उन्हें लगता है कि मैं अनु की बात करके इसे दुखी कर दूँगी। अगर ग़लती से मैं अनु की बात निकाल लेता तो वह कुछ ही देर में विषय बदल देतीं। इन बीते सालों में माँ ख़ूब सारी बातों का रटा-रटाया-सा पुलिंदा लिए मुझसे फ़ोन पर बात करती थीं। फिर बीच में बातों के तार टूट जाते या पुलिंदा ख़ाली हो जाता तो हम दोनों चुप हो जाते। बात ख़त्म नहीं हुई है मैं जानता था, वह कुछ और पूछना चाहती हैं। कहना चाहती हैं। कुछ देर मैं उनकी साँसें सुनता और वह धीरे से बिना कुछ कहे फ़ोन काट देतीं । धीरे-धीरे हमारा फ़ोन पर बात करना बंद हो गया। मैं कभी फ़ोन करता तो वह जल्दी-जल्दी बात करतीं मानो बहुत व्यस्त हों। इस बीच वह मुझे ख़त लिखने लगी थीं। शुरू में जब ख़त मिलते तो मैं डर जाता। पता नहीं क्या लिखा होगा इनमें ! पर अजीब बात थी कि वह सारे ख़त मेरे बचपन के क़िस्सों से भरे हुए थे। कुछ क़िस्से इतने छोटे कि उनके कुछ मानी ही न हों। उन ख़तों के जवाब मैंने कभी भी नहीं दिए। मैंने बहुत कोशिश की पर जब भी पेन उठाता तो मुझे सब कुछ इतना बनावटी लगने लगता कि मैं पेन वापिस रख देता। मैं अधिकतर ख़तों में भटक जाता था या कभी-कभी कुछ इतनी गंभीर बात लिख देता था कि उसे संभालने में ही पूरा का पूरा ख़त भर जाता । वह ख़तों में मेरे बचपन के आगे नहीं बढ़ती थीं। बचपन के बाद जवानी थी जिसमें मैं अकेला नहीं था, वहाँ अनु मेरे साथ थी । इसलिए वे ख़त कभी लिखे नहीं गए। खाना खाते वक़्त हम दोनों चुप थे। माँ ने टमाटर की चटनी बनाई थी जो मुझे बहुत पसंद थी। जब भी माँ खाना खाती हैं तो उनके मुँह से खाना चबाने की आवाज़ आती है, करच-करच | मुझे शुरू से यह आवाज़ बहुत पसंद थी। मैंने कई बार माँ की तरह खाने की कोशिश की पर वह आवाज़ मेरे पास से कभी नहीं आई। 

‘क्या हुआ, मुस्कुरा क्यों रहे हो ?” वह मुझे देख रही थीं मुझे पता ही नहीं चला। मैं उस आवाज़ के बारे में उनसे कहना चाहता था पर यह मैं पहले भी उनसे कह चुका हूँ, सो चुप रहा। 

खाना खाने के बाद मेरे दोस्त रिषभ का फ़ोन आया। मैं उसके साथ कॉफ़ी पीने चला गया। रिषभ जानता था माँ आ रही हैं। हमारे दोस्तों के बीच यह बहुत प्रचलित था । जब रिषभ के माँ-बाप शहर आए हुए हों तो हमारी ज़िम्मेदारी होती थी उसे घर से बाहर निकालने की। वह बाहर आते ही लंबी गहरी साँस लेता और कहता, “ओह! मैं तो मर ही जाता अगर तुम्हारा फ़ोन नहीं आता तो ।” coffee shop में जैसे ही रिषभ ने मुझे देखा वह हँसने लगा। “बचा लिया बच्चू ।” मैंने खीसें निपोर दी। उसने कॉफ़ी आर्डर की और मेरे सामने आकर बैठ गया। “क्या, बचा लिया तुझे ?” इस बार उसने प्रश्न पूछा। क्या जवाब हो सकता है इसका! मैं फिर मुस्कुरा दिया और सोचने लगा किससे बचा लिया, माँ से? उनके मौन से ? उन बातों से जो माँ से आँखें मिलते ही हम दोनों के भीतर रिसने लगती थीं? या फिर ख़ुद से ? 

‘मैंने मेघा को भी बुला लिया। वह भी आती होगी।” ‘क्यों?मेघा को क्यों बुला लिया ?” ‘अरे यूँ ही। उसका फ़ोन आया था। वह तेरे बारे में पूछ रही थी । ” “मैं ज़्यादा देर रुक नहीं पाऊँगा। माँ अकेली हैं।” माँ अकेली हैं कहने के बाद ही मुझे लगा, हाँ, माँ बहुत अकेली हैं। इच्छा हुई कि अभी इसी वक़्त वापिस चला जाऊँ। पर मैं बैठा रहा। ‘उसने कहा, उसने तुझे फ़ोन किया था पर तूने उठाया नहीं ? ” ‘हाँ! मैं व्यस्त था ।” 

‘कैसी हैं माँ ?” 

“अच्छी हैं।”

‘यार सुन, चली जाएँगी माँ कुछ दिनों में इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। “

“नहीं, मैं परेशान नहीं हूँ। सब ठीक है। थैंक गॉड तूने फ़ोन कर दिया। अभी अच्छा लग रहा है। ” 

यह सुनते ही रिषभ ख़ुश हो गया। जो वह सुनना चाहता था मैंने कह दिया था। तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं उसकी तरफ मुड़ा ही था कि वह मेरे गले लग गई। कुछ इस तरह कि ‘मैं तुम्हारा दुःख समझती हूँ’। मैं समझ गया यह मेघा ही है। वह कुछ देर तक मेरे गले लगी रही। मैं थोड़ा असहज होने लगा था। तभी वह मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगी। मुझे ऐसी सांत्वनाओं से हमेशा घृणा रही है। मैंने तुरंत मेघा को अलग कर दिया। वह मेरी बग़ल में बैठ गई और बैठते ही उसने भरे-गले से पूछा- “कैसे हो ?” 

मेरी इच्छा हुई कि अभी इसी वक़्त यहाँ से भाग जाऊँ । ‘कॉफी पियोगी ?” यह कहते ही मैं उठने लगा। तभी रिषभ, The Matchmaker बोला “तम लोग बैठो। मैं लेकर आता हूँ कॉफ़ी।” रिषभ के जाते ही मेघा ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया। ‘‘मैंने तुम्हें फ़ोन किया था।” “हाँ, मैं बिज़ी था । ” “Yeah. I understand.” 

sorry “मैं यहाँ ज़्यादा रुक नहीं पाऊँगा। माँ घर में अकेली होंगी।” “तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ आ सकती हूँ।” 

“no, thank you. 

मुझे पता है रिषभ कॉफ़ी लेकर जल्दी नहीं आएगा। वह हम दोनों को अकेले समय देना चाहता है। मेघा बहुत अच्छी लड़की है पर उसमें मातृत्व इतना भरा हुआ है कि वह मुझे असहज कर देती है। रिषभ के हिसाब से वह मेरा ख़्याल रखती है, जबकि मेरे हिसाब से वह उन महिलाओं में से है जो दूसरों के दुःख की साथी होती हैं। उन्हें इस काम में बड़ा मज़ा आता है। दूसरों के दुःख में एक सच्चे दोस्त की हैसियत से भागीदारी निभाना। मेघा जब भी मुझे देखती है मुझे लगता है कि वह मेरे चेहरे में दुःख की लकीरें तलाश कर रही है। उसके साथ थोड़ी देर रहने के बाद मैं सच में दुखी हो जाता हूँ। रिषभ के कॉफ़ी लाते ही मैं उठ गया। रिषभ मना करता रहा पर मैं नहीं माना । जाते-जाते मेघा ने बहुत गंभीर आवाज़ में मुझसे कहाँ कि ‘you know I am just a phone call away. ‘ मैंने हाँ में सिर हिलाया और लगभग भागता हुआ अपने घर चला गया। 

मेरी कभी-कभी इच्छा होती थी कि मैं झंझोड़ दूँ या पुरानी घड़ी की तरह माँ और मेरे बीच के संबंध को नीचे ज़मीन पर दे मारूँ और यह संबंध फिर से पहले जैसा काम करना शुरू कर दे। बीच में बीते हुए सालों को रबर लेकर मिटा दूँ। घिस दूँ, कोई भी निशान न रहे। मैं सब भूलना चाहता हूँ पर माँ भूलने नहीं देतीं। शायद माँ भी सब भूलना चाहती हैं पर मेरे अगलबग़ल के रिक्त स्थान में उन्हें बार-बार अनु का न होना दिख जाता होगा। 

अनु यहीं है, इसी शहर में। अगर वह किसी दूसरे शहर में होती या दिल्ली में, अपनी माँ के पास चली जाती तो शायद सबकुछ थाड़ा सरल होता। माँ अभी भी आशा रखती हैं कि सबकुछ पहले जैसा हो सकता है। जीवन कितनी तेजी से आगे बढ़ जाता है पता ही नहीं चलता। मा बहुत पुराना जी रही हैं। नया उन्हें कुछ भी नहीं पता। उन्हें नहीं पता कि अनु अब किसी और के साथ रहने लगी है। वह उससे जल्द शादी करने वाली है। हमारा लिखित, क़ानूनन तलाक़ हो चुका है, जिसके पेपर मैंने न जाने क्यों अपने ज़रूरी काग़जातों के बीच संभालकर रखे हैं। मैं कभी-कभी उसे अकेले में खोलकर पढ़ लिया करता था । पूरा शुरू से आख़िर तक। हमेशा मुझे आश्चर्य होता था कि एक निजी संबंध को अलग करने में कितने सरकारी मरे हुए शब्दों का प्रयोग किया जाता है। मुझे हमेशा वह एक कहानी की तरह लगता था। मैंने दरवाज़ा खोला तो माँ सतर्क हो गईं। मैंने देखा उनके हाथ में मेरी डायरी है। कुछ सालों से मुझे डायरी लिखने की आदत – सी लग गई थी। उसमें मैं दुख, पीड़ा, दिनभर की गतिविधियाँ नहीं लिखता था। उसमें मैं आश्चर्यों को लिखता था। छोटे आश्चर्य । जैसे आज एक लाल गर्दन वाली चिड़िया बालकनी में आई। मैं उसके ठीक पास जाकर खड़ा हो गया पर वह उड़ी नहीं, वह मुझे बहुत देर तक देखती रही या आज चाय में मैंने शक्कर की जगह नमक डाल दिया। माँ ने मुझे देखते ही वह डायरी फ्रिज़ के ऊपर ऐसे रख दी मानो सफ़ाई करते हुए उन्हें वह नीचे पड़ी मिली हो । 

‘रात को क्या खाओगे ?” माँ ने तुरंत बात बदल दी। मैंने डायरी को अलमीरा के भीतर, अपने कपड़ों के नीचे दबा दिया। 

‘आज कहीं बाहर चलकर डिनर करें ?” “कहाँ जाएँगे ?” 

“बहुत-सी जगह हैं। चलिए ना, मैंने भी बहुत दिनों से बाहर खाना नहीं खाया है।” 

“ठीक है।” माँ को बाहर होटल में खाने में बहुत मज़ा आता था। जब भी वह बहुत ख़ुश होती थीं तो कहती थीं, “चलो, आज बाहर खाना खाते हैं’। एक बार अनु और मैं उन्हें सिज़लर खिलाने ले गए थे। उन्हें सिजलर खाता देखते हुए हम दोनों की हँसी रुक ही नहीं रही थी । 

हम दोनों एक साउथ इंडियन रेस्टोरेंट में जाकर बैठ गए। मैंने स्पेशल थाली आर्डर की और माँ ने रेग्युलर। मुझे बहुत भूख लग रही थी, सो मैं थाली आते ही खाने पर टूट पड़ा। माँ बहुत धीरे-धीरे खा रही थीं। कुछ देर में उन्होंने खाना बंद कर दिया। ‘खाना ठीक नहीं लगा क्या ?” मैंने खाते हुए पूछा। “मन खट्टा है। स्वाद कहाँ से आएगा!” 

मेरा भी खाना बंद हो गया। जिन बातों के ज़ख़्म हमने घर में रखे थे, मुझे लगा वे यहाँ फूट पड़ेंगे। 

‘क्या हुआ ?” मैं पूछना चाहता था पर मैं चुप रहा। माँ पानी पीने लगीं। मेरी भूख अभी ख़त्म नहीं हुई थी पर एक भी निवाला और खाना मेरे वश में नहीं था ।

‘भाई कैसा है ?” 

माँ ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। भाई और मेरी बातचीत बहुत पहले बंद हो चुकी है। मेरे अकेले रह जाने का ज़िम्मेदार वह मुझे ही मानता है। माँ उसी के साथ रहती हैं। उसने माँ को भी मना कर रखा था मुझसे मिलने के लिए। अब शायद उसका गुस्सा भी शांत हो गया होगा और उसने माँ से कहा होगा कि जाओ देख आओ अपने लाडले को। और माँ भागती हुई सब ठीक करने चली आईं। 

‘अजीब-सा बनाया है आपने यह। कोई स्वाद ही नहीं है।”

मैंने वेटर को बुला के फटकारा। वह दोनों थालियाँ उठाकर ले गया। “माँ, चलो आइसक्रीम खाते हैं। ” 

“मुझे कुछ भी नहीं खाना है। कुछ भी नहीं चल घर चलते हैं।” मैंने बिल चुकाया और हम दोनों घर वापिस आ गए। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और वह मुझे लेकर बालकनी में चली आईं। वह हमेशा ऐसा ही करती थीं। जब भी कोई ज़रूरी बात हो वह हाथ पकड़कर, अलग ले जाकर बात कहती थीं पर यहाँ तो कोई भी नहीं था। शायद बात ज़्यादा ज़रूरी होगी। 

“अब तू क्या करेगा ?” 

‘कुछ भी नहीं माँ। मैं क्या कर सकता हूँ!” “तू एक बार उसे फ़ोन तो कर लेता !” “नहीं, उसने मना किया है। ” “क्या, क्यों ? तू उसका पति है। तू फ़ोन भी नहीं कर सकता है। क्या ?” 

माँ की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई। मैं चुप ही रहा। “तू बहुत ज़िद्दी है । यह ठीक नहीं है। कभी-कभी तुझे जो अच्छा न लगे वह भी तुझे करना चाहिए। कभी तो अपने अलावा किसी और के बारे में सोच । तू हमेशा, हर जगह महत्वपूर्ण नहीं है।” “माँ इस संबंध को अब नहीं बचाया जा सकता है।” ‘अगर तू चाहे तो सब हो सकता है।” अब वह समय निकल चुका है। यूँ मेरे हाथ में कुछ था भी नहीं।” ‘क्या मतलब समय निकल चुका है ?” 

‘जैसे आप यह सब होता हुआ देख रही हैं वैसे ही मैं भी यह सब होता हुआ देख ही रहा हूँ।” 

“तू सीधे-सीधे क्यों नहीं बात करता है ?” 

क्या सीधे-सीधे बात की जा सकती थी ? शायद मैं सीधे-सीधे बात कर सकता पर उन सीधी बातों के शब्द इतने नुकीले थे कि वह मेरे कंठ में कहीं अटक जाते, चुभने लगते। मैं सब कुछ सीधा ही कहना चाहता पर उस चुभन के कारण बाहर अर्थ बदल जाते। मैं अब सीधी बात नहीं कह सकता हूँ। मैं बालकनी से निकलकर भीतर चला आया। माँ वहीं खड़ी रहीं। मैं जानता हूँ इस वक़्त माँ मेरी बातों के ताने-बाने से अर्थ निकालने में जुटी होंगी। फिर उन अर्थों के बहुत से सवाल होंगे और उन सवालों के जवाब फिर मेरे कंठ में चुभेंगे और इस बार मैं चुप रहूँगा। क्या हुआ था मेरे और अनु के बीच ? अब मैं उसके बारे में सोचता हूँ तो मुझे हँसी आ जाती है। हम दोनों एक लंबी सैर के लिए निकले थे। मैं अपना वॉलेट घर पर भूल गया। उसने कहाँ, “क्यों चाहिए तुम्हें वालेट ? तुम्हारे पास कभी पैसे तो होते नहीं है।” पर मैं वापिस घर चला गया अपना वॉलेट लेने। जब मैं वापिस आया तो वह वहाँ पर नहीं थी। वह चली गई थी। मैंने उसे फ़ोन किया, “कहाँ चली गई ?” उसने कहा, “आती हूँ।” वह बस आने ही वाली थी और मैं इंतज़ार नहीं कर रहा था। जब मैंने इंतज़ार करना शुरू किया, वह वापिस नहीं आई। 

माँ बहुत देर बाद वापिस कमरे में आईं। मैं दोनों के बिस्तर लगा चुका -मुँह धोए, अपने बैग से सुंदरकांड की छोटी-सी किताब निकाली और उसका पाठ करने लगीं। मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। बचपन से ही मुझे माँ के मुँह से सुंदरकांड सुनने की आदत है। कुछ देर में मुझे झपकी आने लगी। कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। अचानक मुझे आवाज़ सुनाई दी ‘बेटा… बेटा..।” 

मैं थोड़ा हड़बड़ाकर उठा। माँ मेरी बग़ल में बैठी थीं। “क्या हुआ माँ ?” 

“तेरी कमर में दर्द रहता है ना, तेरी गर्म तेल से मालिश कर देती हूँ।” मैंने देखा माँ के हाथ में एक कटोरी है। 

“कितना बज रहा है ?” 

“तू सो जा ना। मैं मालिश करती रहूँगी ।” “माँ मेरी कमर ठीक है बिल्कुल। कुछ नहीं हुआ है।” “मुझे सब पता है। तू पलट जा, चल।” मैं पलट गया और माँ मेरी कमर की मालिश करने लगीं। मालिश के दौरान मैं माँ को कहता रहा, “बस..बस.. हो गया।” पर माँ नहीं मानी। 

मैं उठकर बैठ गया। “क्या हो गया बेटा ?” “बाथरूम से आता हूँ।” 

मैं बाथरूम में जाकर थोड़ी देर बैठ गया। माँ मेरी मालिश नहीं कर रही थीं वह अपने उस बेटे को छू रही थीं जिसे उन्होंने बचपन में अपना दूध पिलाया है, नहलाया-धुलाया है। जिसे उन्होंने अपने सामने बड़ा होते देखा था। मैं वह नहीं हूँ। मैं बड़ा होते ही दूसरा आदमी हो चुका हूँ। बचपन मेरे सामने एक खिलौने की तरह आता है जिससे मैं खेल चुका हूँ। मेरे घर में वह खिलौना अब सजावट की चीज़ भी नहीं बन सकता है। मैंने मुँह पर कुछ पानी मारा। बाहर आया तो देखा माँ अपने बिस्तर पर लेट चुकी हैं। 

“लाइट बंद कर दूँ?” 

“हम्म.. 

मैंने लाइट बंद कर दी। धीरे से अपने बिस्तर में घुस गया। कुछ करवटों के बाद अचानक माँ की आवाज़ आई। “बेटा कल मेरा रिज़र्वेशन करा देना।” कुछ दिन रुक जाओ।’ ‘नहीं, तेरे भाई ने जल्दी आने को कहा था।” “ठीक है।” मौन। सन्नाटा। कुछ करवटों की खरखराहट। फिर मौन और अंत में नींद।

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