बड़े कमज़ोर होते हैं मजबूत दिखने वाले ये लोग।

 24 दिसम्बर को जब सभी नई उम्मीद, नई आशा के साथ जीवन में कुछ नया मिलने की आहट से खुश होकर सेंटा का इंतजार कर रहें होतें हैं, ठीक उसी दिन टीवी इंडस्ट्री की जानी-मानी अभिनेत्री तुनिशा शर्मा ने अपनी सारी उम्मीदें खोते हुए अपने मेकअप रूम में सुसाइड कर लिया वो भी तब जब उनके पास नए-नए प्रोजेक्ट मिल रहें हैं,बॉलीवुड इंडस्ट्री में उन्हें पहचान मिल रही थीं उसी वक्त उन्होंने ये कदम उठा लिया। जानते हैं क्यों…? क्योंकि उन्हें अपने को-स्टार शीजान खान से प्यार था और कुछ वक्त पहले उसने इनसे ब्रेकअप कर लिया था जिसे ये बर्दाश नहीं कर पायी और मात्र 20 वर्ष की आयु में खुद को मौत के हवाले कर दिया,बिलकुल उसी तरह जैसे कोई नॉर्मल लड़की करती हैं। पर्दे पर जो मजबूत,साहसी,स्वाभिमानी,जिंदादिल किरदार निभाते हुए इन्होने अपनी पहचान बनाई थी लोगों के बीच वो प्यार में हारी हुई,कमज़ोर,मजबूर लड़की से बिलकुल अलग थी।                    इस प्यार को हम क्या नाम दे?                                       Love is love……                                                     


ये एकलौती ऐसी ऐक्ट्रेस नहीं हैं जिन पर उनके खुद के निभाए किरदार का कोई फर्क नहीं पड़ा इनसे पहले भी प्रत्युषा बैनर्जी, वैशाली ठक्कर, सेजल शर्मा और जिया खान जैसी कई सुप्रसिद्ध अभिनेत्रियों ने अपने निभाये किसी भी किरदार से कुछ भी ना सीखते हुए कम उम्र में ही सुसाइड कर लिया था।सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें प्यार में धोखा मिला था।

इनके फैन्स को बहुत हैरानी होती हैं जब उन्हें पता चलता हैं जिसे वो अपनी जिन्दगी का आदर्श मान रहें थें वो खुद अपनी लाइफ की आदर्श नहीं बन पायी। कई एक्टर्स भी रहें हैं जिन्होंने अपने चेहरे पर मजबूती का झूठा मुखौटा लगाकर दूसरों को मोटिवेट करने का काम किया हैं लेकिन जब खुद जिन्दगी से दो-चार हुए तो मरना मुनासिब समझा।अपने SSR का उदाहरण इनमें हमेशा ही पहले नंबर पर दिया जाएगा। ऐसे प्यार में हारे हुए एक्टर्स को देख कर मुझे लगता हैं कि इन्होने अपने निभाए किरदार को अपने हाथों से ही गलत साबित कर दिया,इन्होने अपने सारे किरदार को बेचारा बना कर छोड़ दिया। जब भी कोई कोई बालिकावधु में बड़ी आनंदी को देखेगा तो उसकी मजबूती नहीं बल्कि प्रत्युषा का कमजोर चेहरा दिखेगा और दर्शक के मुँह से बस इतना निकलेगा हाय!ये बेचारी तो मर गई। जब भी कोई ‘छिछोरे’ में अनिरुद्ध पाठक को देखेगा तो उसका मोटिवेशन नहीं दिखेगा बल्कि उनके जहन में इतना ही आएगा कि बेचारा डिप्रेशन को नहीं झेल पाया। ना जाने ऐसे कितने ही एक्टर-ऐक्ट्रेसेस हैं जो रुपहले परदे पर एक से बढ़िया एक किरदार करतें हैं ताकि उनकी पहचान बन सके, लोग उन्हें फॉलो कर सकें लेकिन असल जिन्दगी में वो खुद इतने कमज़ोर होतें हैं कि कोई भी उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाकर उन्हें मौत की दहलीज तक पहुँचा सकता हैं। कभी प्यार के नाम पर,कभी शोषण से तो कभी तंगहाली में हमारे सामने हीरो बनके पेश आने वाले ये एक्टर्स कायरों की तरह मौत को गले लगा लेते हैं ।

ये सबसे बड़ा सबक होना चाहिए ऐसे दर्शकों के लिए जो परदे पर अपने फेवरिट किरदार की हर बात,उसकी स्टाइल,उसका चाल-चलन सब कुछ एक भक्त की तरह फॉलो करतें हैं। लेकिन इन घटनाओं से उन्हें समझना चाहिए कि परदे पर दिखने वाला शख्स उनका हीरो नहीं,उनकी हिरोइन नहीं बल्कि उनके माता-पिता या वो खुद अपनी लाइफ के हीरो हैं। मनोरंजन जगत के किसी सेलिब्रिटी को फॉलो करने के बजाय मैं सलाह दूंगी कि आप उन लोगों को फॉलो करें जो जिन्दगी में इस प्रेम रोग की मुसीबत के अलावा अन्य मुसीबतों का सामना जिन्दादिली से करतें हैं और जरा-जरा सी बात पर मरने का नहीं सोचने लगते। मैं उस कबाड़ी को भी एक रियल हीरो बोल सकती हूँ जो दिनभर इधर-उधर से कबाड़ इक्ट्ठा करता रहता हैं, जिसके दिमाग में बच्चों की स्कूल फीस चल रही होती हैं, बीमार माँ बाप की दवाई चल रही होती है,बीवी की छोटी-छोटी जरुरतें चल रहीं होतीं हैं, उधार चल रहा होता हैं,शरीर में कमजोरी चल रही होती है लेकिन फिर भी शाम को वो मुस्कुराते हुए घर जाता हैं ताकि उसका परिवार परेशान ना हो। क्या ऐसा ही दोहरी जिन्दगी जीने वाले एक्टर्स नहीं सोच सकतें अपने माँ-बाप के बारे में? 

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