मन्नू भंडारी की रचना- नशा, अंतिम भाग।

 “माँ, मेरा बटुआ रख लेना जरा,” बटुआ थमाकर, धोती कन्धे पर डालकर किशनू नहाने चला गया। आनन्दी का मन हुआ था, कह दे; मेरे पास बटुआ मत रख किशन, नहीं तो… पर उससे कुछ भी नहीं कहा गया था। किशनू घर से अभी निकला भी नहीं था कि शंकर सामने खड़ा था : “निकाल रुपए । तू सोचती है, सारी कमाई तू अकेली ही हड़प लेगी?… बेटे का पैसा अकेले-अकेले न पचेगा, वह मेरा भी बेटा है,निकाल ।” 

काँपते हाथ से आनन्दी ने दो रुपए निकालकर दे दिए। अन्दर कितने रुपए हैं, उसने झाँककर भी नहीं देखा। वह किशनू से कह देगी कि उसी ने रुपए निकाले हैं, उसे जरूरत थी। लेकिन शंकर को क्या कभी समझ नहीं आएगी? वह पीकर आएगा, वैसे ही बकेगा-झकेगा। क्या सोचेगा किशनू? अभी तक किशनू ने नहीं पूछा था कि कक्का अब भी पीते हैं या छोड़ दी। क्या पूछे, पीनेवालों की सूरत ही बता देती है, पर क्या आज ही वह सब नाटक फिर होना था? क्यों उसने रुपए दिए? उसे अपने पर ही क्रोध आने लगा। मना कर देती तो क्या कर लेता? अब उसे डर ही किस बात का है? उसका कमाऊ बेटा उसे लेने आ गया है। वह अपने को ही कोसने लगी-उसे रुपए नहीं देने थे । क्यों दे दिए उसने रुपए ? 

किशनू खा-पीकर गाँव में लोगों से मिलने निकला, तो बोला : “माँ, ज़रा बटुआ देना।” काँपते हाथ से आनन्दी ने बटुआ पकड़ा दिया। दो रुपए की बात गले में आकर भी अटक गई । बिना देखे ही बटुआ जेब में रख, किशनू निकल गया । आनन्दी उसे देखती रही लम्बा-चौड़ा जवान!… कल पड़ी-पड़ी वह सोच रही थी कि बेटे को अपनी दुःख-गाथा सुनाएगी… इतने दिनों का अपना बोझ हल्का करेगी। पर बेटे के सामने तो उसकी जीभ ही जैसे तालू से सट गई । यह किशनू अब बारह साल पहलेवाला किशनू नहीं रह गया था। वह सोच रही थी कि पहले की तरह ही वह उसकी गोद में सो जाएगा और वह एक-एक करके बताएगी कि उसने कितना कुछ सहा । लेकिन… 

“सत्यानाश हो उस हरामी के पिल्ले का, जिसने ऐसी जानलेवा चीज़ बनाई !” नशे में धुत्त, लड़खड़ाता शंकर घुसा तो किशनू अवाक् सा उसका मुँह देखता ही रह गया। उसकी आँखों में ख़ून उतर आया। उसने आनन्दी की ओर देखा । आनन्दी की अपराधी नज़रें झुक गईं। “क्या-क्या लाड़ लड़ रहा है माँ से?…अरे, अपने बाप को भी तो कुछ दे!…जो कुछ देना है इधर दे, इधर। मैं तेरा बाप हूँ, साले!” लड़खड़ाता हुआ शंकर भीतर चला गया। “यह पैसा कहाँ से लाते हैं?” आनन्दी चुप । 

“मैं पूछता हूँ, यह पैसा कहाँ से लाते हैं?” आनन्दी की आँखों से टप्-टप् आँसू बहने लगे। 

“तू देती है? तू पीने को देती है? क्यों? क्यों देती है तू अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार रही है, माँ ?” सिसकियाँ, दबी-दबी, घुटी-घुटी सिसकियाँ ।

“मैं सोच रहा था कि पैसा नहीं रहा होगा तो कक्का रास्ते पर आ गया होगा। पर अभी भी वही हाल है। पिछले बारह सालों से यों ही तू इस निखट्टू को पिला रही है न?”                                    

“मुझे यहाँ से ले चल, किशनू… यहाँ से ले चल ! मैं अब एक दिन भी इस घर में रहना नहीं चाहती। मैंने बहुत सहा है, अब और नहीं सहा जाता, मुझे यहाँ से ले चल आज ही ।” आनन्दी फूट-फूटकर रोने लगी। 

किशनू ने कमीज़ की बाँहों से ही आँखें पोंछते हुए कहा : “आज ही तुझे ले चलूँगा, माँ, आज ही। सोचा तो था कि कक्का को भी ले चलूँगा, पर अब नहीं । यह ले जाने लायक़ ही नहीं हैं । ” 

“कौन साला जाता है तेरे साथ? निकल जा तू मेरे घर से। दोनों निकल जाओ। कोई बेटा-बेटी नहीं है मेरा। कोई औरत-वौरत नहीं है मेरी । जाओ, सब जाओ ।” खटिया पर बैठा-बैठा शंकर अनाप-शनाप बक रहा था ।                                                दूसरा आदमी – मानव कौल।                                         खोटा सिक्का- मन्नू भंडारी।                                        विजेता – रघुवीर सहाय।                                                Son – Maxim gorky                                             मक्रील 

आनन्दी सारे दिन रोई। उसने अपने फटे-पुराने कपड़ों की गठरी बाँध ली। रो-रोकर सबसे मिल आई। उसका बेटा उसे लेने आ गया। वह जा रही है, अब कभी इस घर में नहीं आएगी। पिछले चालीस साल उसने इसमें काटे कामना की है कि हे भगवान, किसी तरह मेरा बेटा लौटा दे, अपने बेटे को हैं। इस घर को और घरवाले को अपना खून पिलाया है। रो-रोकर उसने लेकर मैं कहीं चली जाऊ।… आज वह दिन आ गया। फिर भी आनन्दी रो ही रही है। शाम को शंकर आया तो नशे में धुत्त । कपड़े की बँधी गठरी को लात से एक ओर उछालता हुआ बोला: “मैं एक-एक का खून पी जाऊँगा। देखूँ कौन माई का लाल ले जाता है मेरी जोरू को!” और उसने आनन्दी को बड़ी बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। एक भरपूर लात पेट में पड़ी तो आनन्दी को गश-सा आ गया। कराहकर इतना ही वह कह सकी: “बचा, बेटे, किशनू, बचा!” किशनू के नथुने फड़क रहे थे और आँखों के डोरे सुर्ख हो उठे थे। एक धक्के में उसने शंकर को दूर पटक दिया और आनन्दी को खाट पर डालता हुआ बोला : “और दे पैसे !… मेहनत-मज़दूरी कर और पिला इस साँड़ को!” किशनू आनन्दी पर ही बरसने लगा । दर्द से कराहती हुई आनन्दी कह रही थी : “मुझे यहाँ से ले चल, किशनू!” 

निकलने की बेला आई, तो रुलाई का आवेग सँभल नहीं रहा था। आस-पास की सभी औरतें विदा करने आई थीं । “ले जा, भइया, अपनी माँ को । बड़े-बड़े दुःख सहे हैं बेचारी ने।” “अरे किशनू, इस गाय को ले जा शंकर कसाई के घर से । कसाई भी अच्छा जो एक दिन ही मारकर छुट्टी कर देता है। इससे तो…” चलने से पहले झिझकते-झिझकते आनन्दी ने कहा: “बेटा, दस रुपए हों तो दे, मानकी की माँ के चुकाने हैं।” “हाँ-हाँ, ले,” दस का एक नोट किशनू ने माँ के हाथ में थमा दिया। सबकी नज़रें बचाकर आनन्दी उस नोट को ताँबे की कटोरी में डाल आई। फिर घबराते दिल से आकर सबके बीच में मिल गई। रात के धुँधलके में आनन्दी किशनू के साथ इक्के पर बैठकर चली। धूल उड़ाता इक्का आगे बढ़ गया। घर पीछे छूट गया। पता नहीं, कहाँ बैठकर वह पी रहा होगा। 

शहर में बना छोटा सा, साफ़-सुथरा, पक्का मकान । आनन्दी की छोटी-से-छोटी आज्ञा को पूरी करने में सदा तत्पर बेटे-बहू ।इससे बड़े सुख की कल्पना भी वह नहीं कर सकती थी । 

 दुकान से आते ही किशनू पास आकर पूछता : “क्या ख़बर है, माँ ?” “अच्छी हूँ, बेटा ।” 

 कुछ भी चाहिए तो माँग लेना । मन ऊबे तो पड़ोसियों के यहाँ चली कुछ जाया करो।

किशनू खाता तो माँ को पास बिठा लेता। बहू गर्म-गर्म फुलकियाँ उतारकर देती जाती । घी महकता रहता। दो तरकारियाँ, दाल, चटनी… और | अनायास ही आनन्दी की आँखों में न जाने ऐसा क्या पड़ जाता कि पानी-ही-पानी बहने लगता। वह बार-बार आँखें पोंछती, पर एक चित्र था कि मिटता नहीं, धुँधला नहीं होता, उभर- उभरकर आता…रसोई के अँधेरे कोने में अधजली, अधपकी सूखी रोटियाँ, न घी, न तरकारी, पानी के घूँट के सहारे जैसे-तैसे निगलता हुआ शंकर… 

“देखो अम्मा, एक और रोटी नहीं लेते। एकदम करारी करके लाई हूँ। यह भी कोई खाना हुआ भला?” बहू ठनककर शिकायत करती । 

करारी और गर्म रोटी का कितना शौक है शंकर को! ठंडी रोटी देखकर वह आनन्दी को मार बैठता था । 

“कितना तो खा लिया, तुम तो हद कर देती हो । देखो तो माँ, तुम्हारी इस बहू ने कितना मोटा कर दिया है मुझे ।” 

“कहाँ हो रहा है मोटा? जवानी में ऐसा शरीर नहीं रहेगा तो बुढ़ापे में क्या करेगा ? सारा दिन काम करके आता है, खिलाएगी नहीं? कौन औरत होगी जो अपने सुहाग का ख़याल न रखती होगी! अपने आदमी का…” बाक़ी बातें गले में ही अटक जातीं। “आज यह क्या हो रहा है, माँ ?” 

“कुछ नहीं, यों ही जरा सिलाई लेकर बैठ गई।” सिटपिटाते आनन्दी ने कहा। “तुम बहू से करवा लिया करो, तुम्हारी बहू सिलाई जानती है।”

“मेरी सिलाई नहीं है, बेटा, पड़ोसियों की ले आई हूँ। सारे दिन खाली बैठे-बैठे ऊब जाती हूँ न, इसी से ।” 

“ओ हो ! यह बात है! भले लोग हैं, चली जाया करो उधर ।” “दिन में चली जाती हूँ।” माँ तुम्हारा मन तो लग जाता है। आते-जाते किशनू पूछता ही रहता।

बहू दिन में दस चक्कर लगाती – अम्माजी, यह खा लीजिए। अम्मा, आज क्या तरकारी बनाऊँ?… लाओ, अम्मा, तुम्हारे सिर में तेल डाल दूँ। आजकल आनन्दी सारे दिन सिलाई करती है। पड़ोसियों के घर में शादी है, ढेर-सारी सिलाई ले आई है। बहू सोचती है, चलो अच्छा है, अम्मा का मन लगा रहता है । अम्मा ने बड़ी लगन से बहू से क्रोशिये की बेल बनाना सीखा । आनन्दी की लीची – जैसी गिचगिच आँखें और महीन धागे का फन्दा – आँखों पर ज़ोर पड़ता है, पर वह छोड़ती नहीं । 

रात में देर तक आँखें गड़ाए हुए क्रोशिया चलाते देख एक दिन किशनू बोला : ‘‘माँ, छोटी-मोटी सिलाई कर दिया करो। तुम तो बेगार ही लेकर बैठ गईं पड़ोसियों की। अब क्या तुम्हारी आँखें ऐसी हैं जो यह सब काम करो ?” 

तो आनन्दी ने उठाकर रख दिया और बत्ती बुझाकर सो गई। लेकिन आधी रात के क़रीब जब सब सो गए तो वह फिर उठी, दरवाज़ा बन्द किया और बत्ती जलाकर बुनने बैठ गई। अँगुलियाँ उसकी जकड़ रही थीं, पर वह बुनती रही । धीरे-धीरे फन्दे में से फन्दा निकलता रहा। दूसरे दिन आनन्दी को मामूली सी हरारत हो गई। आनन्दी बुखार में भी बराबर काम करने की आदी थी, पर किशनू और बहू ने उसे सुला दिया। किशनू नाराज़ भी हुआ : “इस तरह सिलाई-बुनाई करने की क्या जरूरत थी भला? बैठे-बिठाए बुखार बुला लिया।” 

“मैं तो अच्छी हूँ, तुम लोगों ने ज़बर्दस्ती मुझे बीमार बना दिया।” “अच्छा-अच्छा, तुम बिस्तरे से मत उठो। देखो, माँ को उठने मत देना। आऊँगा तो दवा लेता आऊँगा।” 

देवी-देवता जैसे हैं उसके बेटे-बहू ,कितना ख़याल रखते हैं उसका ! जाने कौन सा पुण्य किया था उसने, जो उसका बुढ़ापा सुधर गया। एक ठंडी साँस उसके कलेजे से निकल गई— सन्तोष की या विषाद की, वह स्वयं नहीं समझ पाई । 

किशनू दवाई लेकर लौटा तो आनन्दी तकिए के सहारे बैठी अपनी अकड़ी हुई उँगलियों को देख रही थी। जब तक हाथ चलते रहे, कुछ पता नहीं लगा था, पर अब तो ज़रा सा हिलाने में भी दर्द होता है । किशनू को देखते ही उसने हाथ चादर के नीचे ढँक लिए। 

“क्या ख़बर है माँ, कैसा है बुख़ार ?” और आनन्दी के पास बैठकर उसने उसका हाथ खींचकर बाहर निकाला। 

आनन्दी दर्द को पी गई। 

” बुख़ार तो इस समय नहीं लगता ।” पत्नी को पुकारते हुए किशनू बोला : “अरे, सुनती हो, ज़रा एक गिलास पानी लाना। अम्मा को दवाई देनी है।” और फिर जेब से पुड़िया और शीशी निकालने लगा। 

तभी पड़ोसियों का दस साल का लड़का हाथ में काग़ज़ का छोटा सा ठुकड़ा लिए हुए घुसा। 

“नानीजी, अम्मा ने यह रसीद भेजी है और कहा है कि देख लीजिए, पूरे बीस रुपए पहुँच गए हैं।” रटे हुए वाक्य की तरह वह बोला और काग़ज़ उसने आनन्दी की ओर बढ़ा दिया । “रसीद? बीस रुपए ?” आश्चर्य से किशनू ने कहा और आनन्दी के उठे हुए हाथ को पीछे छोड़कर उसने लड़के के हाथ से रसीद ले ली। वह बीस रुपए के मनीऑर्डर की रसीद ही थी। मनीऑर्डर शंकर के पास भेजा गया था। किशनू ने आनन्दी की ओर देखा। लड़का लौट रहा था; पर जैसे उसे फिर कुछ याद आ गया हो, वह फिर मुड़ा: “अम्मा ने कहा है, आपका सारा हिसाब हो गया है नानीजी” और वह दौड़ गया । आनन्दी की अपराधी नज़रें एक क्षण को किशनू से मिलीं और फिर नीचे को झुक गईं। “ऐसा ही था तो तू मुझसे कह देती, माँ। रात-दिन जुतकर सिलाई-बुनाई करने की क्या जरूरत थी ?” आनन्दी की आँखों से टप्-टप् आँसू बह रहे थे।

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